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गुरुवार, 15 जुलाई 2021

ज्योतिषाचार्य स्व श्री मुकुंद राम बड़थ्वाल “दैवेज्ञ” - एक परिचय


(ज्योतिषाचार्य स्व श्री मुकुंद राम बड़थ्वाल “दैवेज्ञ” )


जब भी किसी बड़थ्वाल का नाम सुनता हूँ तो अनायास ही मन ख़ुशी अनुभव करता है और यदि कोई ऐसा है जिसके कृतित्व व् व्यक्तित्व पर बड़थ्वाल कुटुंब को गर्व होना चाहिए तो गर्व होता है. हम ही परिचित नहीं तो कैसे उनके कृतित्व को अन्य लोगो तक पहुंचाए. ऐसे ही एक प्रकांड ज्योतिषविद्ध श्रद्धेय स्व मुकुंद राम बड़थ्वाल जी के बारे में मुझे अब पता चला. जानकरी मिलने पर जो परिचय प्राप्त हुआ वह अद्भुत है. ज्योतिष विद्या में अनुसंधान के प्रक्रिया सा विस्तार दिया है इन्होने. उनके द्वारा ज्योतिष विज्ञानं में  जो श्रम और इस साहित्य को दिया गया है शायद बहुत थोडा ही लोग जानते है अगर कहे की कोई नहीं जानता तो अतिश्योक्ति भी नहीं होगी. गिने चुने लोग तब और अब तो कोई भी नहीं. हमें अपने इस रत्न की केवल अपनों में नहीं, केवल भारत में नहीं बल्कि विश्व से पहचान करवानी होगी. बडथ्वाल होने के नाते हमारे इस बड़थ्वाल कुटुंब का दायित्व भी बन जाता है और उस क्षेत्र ( संस्कृत संस्थाओं ) का भी जिसका वे प्रतिनिधित्व करते थे. आईए आज उस ज्योतिष साधक, संस्कृति साधक को संक्षिप्त में, उनके बारे में जानने का प्रयास करते है. उनका अपने समाज से परिचय करवाते हैं.  

 प मुकंद राम बडथ्वाल का जन्म  ८ नवम्बर १८८७ को उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश का हिस्सा) के खंड ग्राम में हुआ. पिता श्री रघुबर दत्त बड़थ्वाल ( ज्योतिष, कर्मकांड व आयुर्वेदाचार्य) तीन पुत्रो में सबसे बड़े पुत्र मुकुंद राम बड़थ्वाल  को ज्योतिष, एक पुत्र को कर्मकांड व् एक पुत्र को आयुर्वेद की ओर प्रेरित किया. मुकुंद राम जी ने पिताजी द्वारा ज्योतिष विद्या को बचपन से ही ग्रहण करना शुरू किया. एक लोकोक्ति है न कि पूत के पाँव पालने  में ही  दिख जाते  हैं अर्थात  किसी व्यक्ति के भविष्य का अनुमान उसके वर्तमान लक्षणों से लगाया जा सकता है. मुकुंद राम जी ने इस लोकोक्ति को चरितार्थ किया जब उन्होंने मात्र ९ साल की उम्र में ग्रह – गणित ज्ञान अर्जित कर लिया. 
 
इनकी शिक्षा घर, लाहौर व् साहित्यिक साधना देव प्रयाग में हुई  देव्शाला में हुई. १८ वर्ष की आयु में ही मुकुंद जी ने जातक – सारम की रचना की थी. ज्योतिर्य गणित व् सूर्यसिद्धांतो का गहन अध्ययन कर उन्होंने  मुकुद –विनोद सारिणी , मकरंद तति, मुकुंद पद्धिति, प पञ्चांग मन्जूषा, दशा- मन्जरी, सारिणिया बनाई.

मेरा मानना है की आधुनिक ज्योतिर्विद में इनका नाम प्रमुखता से लिया जाना चाहिए. यह उनके अथाह ज्ञान व् कड़ी मेहनत के साथ शोध गर्भित अन्वेषण शामिल है.. लाहौर में एक ज्योतिष शोध संस्थान द्वारा फलित ज्योतिष के ग्रन्थ संकलन हेतु मुकुंद दैवेज्ञ जी ने अनेकों प्रकाशित व् अप्रकाशित ग्रंथो का अध्ययन किया. यह कोई आसान कार्य नहीं था लेकिन उनकी लगन ने ज्योतिष शास्त्र के सभी अंगो का समन्वय कर ज्योतिस्त्तत्व के नाम से रचा जो प्रकाशित हुआ. इस पुस्तक को छपने में मुंबई से तीन व्यापारी केशवलाल वीरचन्द सेठ, राम्निक्लाल श्यामलाल परोख,बादिलाल मोहनलाल शाह का योगदान रहा. इसका संपादन उनके शिष्य प चक्रधर जोशी. गुरु मुकुन्दराम दैवेग्य जी और शिष्य प चक्रधर जोशी जी की जोड़ी, गुरु - शिष्य परम्परा की सटीक उदाहरण थी उनके इस शिष्य ने ही आचार्य मुकुंद दैवेज्ञ ज्योतिः शोध संश्थान  की स्थापना (The Himalayan Astrological Research Institute के अंतर्गत सन १९४६ ई में देवप्रयाग में की थी. इसके अंतर्गत एक नक्षत्र वैधशाला तथा पुस्तकालय भी बनाया बनाया गया.  


मुकुंद जी ने बहुत से ग्रंथो पर संस्कृत में व्याखाएं व् टीकाएँ लिखी. जिनमें से प्रमुख है
भट्तोत्प्ल की आर्या- सप्तति 
वेंकटेश कृत केतकी – ग्रह गणित
विददाचार्य की पद्धति – कल्पवल्ली
मल्लारी की अश्वारूढ़ि
पंडित पद्दनाभ का लम्पाक-शास्त्र
पंडित परमसुख उपाध्याय का रमल –तंत्र

ऊपर लिखी हुई भट्तोत्प्ल की आर्या- सप्तति तो कई वर्षो से राजस्थान विश्वविद्यालय की ज्योतिषाचार्य परीक्षाओं में निर्धारित पाठ्यपुस्तक है. ज्योतिष शास्त्र के विभिन्न पक्षों पर दैवेज्ञ जी ने १२ भावो के फलित पर संकलन ग्रन्थ लिखे हैं. इनमें से कुछ भावो पर उनके निम्नलिखित ग्रन्थ उल्लेखनीय हैं और प्रकाशित भी हैं.

भावमन्जरी
अष्टकवर्ग
आयु-निर्णय
इष्टलग्न- निर्णय
प्रसवचिंतामणि व् नष्ट जातक

ज्योतिष के जिज्ञाशूओ के लिए इसके अलावा भी उनके ग्रन्थ है जैसे बाल बोध दीपिका, वृहद/ ज्योतिष शास्त्र प्रवेशिका, वृहद होड़ा चक्र. साथ ही ज्योतिर्गणित सिद्धांत, जातक ताजिक प्रश्न वृष्टि शकुन वस्तु समर्घ-महर्घ पर भी उन्होंने ग्रन्थ लिखे हैं. इनमे से कुछ प्रकाशित कुछ अप्रकाशित है. सभी ग्रंथों को तालिका रूप में प्रस्तुत करूंगा आगे.

ज्योतिष ग्रंथो के अध्ययन के समय ज्योतिष शब्दों के लिए मुकुंद दैवेज्ञ जी को कई शब्दकोषो में ढूँढना पड़ता था. विभिन्न कोश ढूंढते थे. जैसे  वैश्नीय कोश की खोज की तो पता लगा की एक तो लन्दन में एक भारत में. किसी तरह उनके शिष्यों ने भारत में उस का कोश का पता लगाया उस पुस्तकालय का सदस्य बनाया.   इसलिए साथ साथ उन्होंने ज्योतिष शब्दों को एकत्र करना शुरू किया.  इसके फलस्वरूप उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृति  ज्योतिष शब्दकोष जो की ज्योतिष शास्त्र को एक देन है. सन १९६७ में भारत सर्कार के शिक्षा मंत्रालय की वितीय सहायता द्वारा इसका प्रकाशन हुआ.  इस शब्दकोष में गद्य पद्य उपयोगी शब्द, पर्यायवाची शब्द व् अनेकार्थ शब्दों का भी संकलन है. इस शब्दकोष का आमुख महो महोपाध्याय परमेश्वरानंद द्वारा लिखित है.

उनकी विद्वता का और ज्योतिष पांडित्य ज्ञान का एक उदाहरण उनका एक मौलिक ग्रन्थ ज्योतिषतत्वम है जो १९५५ में प्रकाशित हुआ. लगभग १४०० पेजों के इस ग्रन्थ में ७७७५ स्वरचित श्लोक है.

मुकुंद कोष  का केवल एक ही भाग प्रकाशित हो पाया. अधिकांश रचनाओं को उन्होंने मुकुंद आश्रम में ही सृजन किया.  मुकुंदाश्रम सन १९६० से बनाया गया था. आइये जानते है उनके प्रकाशित व् अप्रकाशित ग्रंथो के नाम:

प्रकाशित ग्रन्थ

पंचांग मंजूषा : मुंबई से कल्याण प्रेस द्वारा सन १९२२

आर्य सप्तति: पाण्डुरंग जीवाजी रामचंद्र येशु शेंडगे मुंबई द्वारा

मुकुंद पद्वति : देवप्रयाग क्षेत्र निवासी श्रीमत पंडित गोवर्धन प्रसाद भट्ट , पंडित रेवतराम जी व् पंडित माधो प्रसाद शर्मा – स्व्मूलेन प्रकशित  १९८३ में नवल किशोर मुद्राणलय मुद्रिता बम्बई 1983

दशामन्जरी : मुकुंद प्रकाशन,जयपुर

ज्योतिषशास्त्र प्रवेशिका:

बृहद होरा चक्रम: मेहर चंद लक्ष्मण दास, संस्कृत – हिंदी ( पुस्तक विक्रेता सैदमिट्ठा बाजार, लाहौर विक्रम संवत १९९३

ज्योतिष रत्नाकर: लाहौर में ( एक भाग ही ही ४०० पन्नो का)

ज्योतिषतत्त्वं: १९५५ प चक्रधर जोशी

आशुबोध टीका:  जयपुर में आचार्य स्वीकृत

ज्योतिष शब्द कोश: १९६७

बृहद ज्योतिष शास्त्र

नष्ट जातकम: रंजन पब्लिकेशन

भाव मन्जरी: रंजन पब्लिकेशन

आयुर्निर्णय: रंजन पब्लिकेशन

अष्टक वर्ग महानिबंध: रंजन पब्लिकेशन

प्रसव चिंतामणि: रंजन पब्लिकेशन

जातक भूषणं: रंजन पब्लिकेशन

वित् एवं कृति प्रबंध

लिंगानुशासन वर्ग

 
अप्रकाशित ग्रन्थ लगभग ३०  (१४ ज्योतिष गणित)
पद्वति कल्पवल्ली
जातक सर
मुकुंद विनोद सारिणी
आयुदार्य संग्रह
मुकुंद विलास सारिणी
एकोद्दिष्ट श्राद्ध पद्वति
मकरन्दतति:
अष्टक वर्ग संग्रह
ज्योति: सार संग्रह
जातक परिजतादी संग्रह
जातकालंकार(टीका)
ताजिक योग संग्रह
मुकुंद योग संग्रह
व्यापार रत्नम
रमल नवरत्नम
जातक सूत्रम
बाल बोध दीपिका
पियूष धरा
मनोरमा
मधुव्रता
कोशानामवली
भूवलय चक्रम
अश्वारूढ़ी
लम्पाक शास्त्रं
प्रश्न दीपिका
स्त्रीजातकम
कोतकीयगृह गणितम
मुकुंदकोश
(ताम्रपत्र - अभिनव वराहमिहिर)

ज्योतिष के मर्मज्ञ पं मुकुंद राम बड़थ्वाल जी को १२ अप्रैल सन १९६७ में भारतीय ज्योतिष अनुसंधान संस्थान ने अभिनव वराहमिहिर की उपाधि से सम्मानित किया. यह उपाधि उन्हें राज्य पाल एम् चेन्ना रेड्डी द्वारा लखनऊ में प्रदान की गई.  वराहमिहिर ईसा की पाँचवीं-छठी शताब्दी के भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे. ये भारतीय ज्योतिष शास्त्र के मार्तण्ड कहे जाते हैं और वे चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य  के नवरत्नों में से एक थे. ज्योतिष समाज में दैवेज्ञ जी की तुलना  वराहमिहिर से किया जाना ही  पंडित मुकुंद राम बड़थ्वाल की महानता का परिचायक है.  उनके मौलिक 40,००० श्लोक है.

मुकुन्दस्य प्रतिज्ञेद्वे कोषम ( मुकुंद्कोश) गंगा गंगां च न त्यजेत  परिज्ञ को अंतिम समय तक निभाया. खंड ग्राम में मुकुंदाश्रम में नदी किनारे ३० सितम्बर १९७९ मुकंद दैवेज्ञ जी ने अंतिम सांस ली.  

उनके लिखित हस्तलिखित ग्रन्थ आज भी बाट जो रहे है सरकार की, किसी प्रकाशक की, किसी ऐसी संस्था की जो संस्कृत में लिखे इन ग्रंथो को अनुवाद करवा कर ज्योतिष के विद्यार्थियों को, शोधकर्ताओं को उपलब्ध हो सके या ज्योतिष में, फलित ज्योतिष पढने वाले प्रयोग करने वाले इसका लाभ उठा सके.

इन सभी जानकारियों हेतु आभारी हूँ उनके पुत्र श्री रमेश बड़थ्वाल जी का, पोती सुश्री सुधा का, पोते श्री शैलेन्द्र बड़थ्वाल जी का व् श्री हर्षवर्धन जी का जिन्होंने आंशिक तौर पर ही सही परन्तु मुझे जानकारी प्रदान की.

प्रकाशित कुछ पुस्तकों ही मुझे पता चल पाया. रंजन पब्लिकेशन ने भी मुझे जानकरी देने से इंकार किया ( उनके पास १० - १२ ग्रन्थ है कुछ ६ या ७ प्रकाशित उसका भी वे ठीक से जानकरी नहीं दे रहे हैं बाकियों का ज्ञात नहीं). यह  अत्यंत निराशा का विषय है कि उनका विस्तृत भंडार आज भी बंद तालो में है. परिवार के सदस्य भी असमर्थता जाहिर करते हैं कई कारणों से. लेकिन एक उत्तराखंडी होने के नाते, बड़थ्वाल होने के नाते यह हम सब का भी सामूहिक कर्तव्य बन जाता है कि हम इन ग्रंथो के प्रकाशनार्थ हेतु कोई योजनाबद्ध तरीके से इसमें पहल करें.

अंत में इस महान ज्योतिषाचार्य मुकंद देवैज्ञ जी की स्मृति में बड़थ्वाल कुटुंब की ओर नमन करता हूँ और विश्वास है आने वाले समय में हम अवश्य उनके अधूरे कार्य ( अप्रकाशित पुस्तकों को प्रकशित करने का) को पूरा करने का प्रयास करेंगे.

 

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
‘बड़थ्वाल कुटुंब’
एवं
महामन्त्री, हिंदी साहित्य भारती (विदेश)


(सहयोग - आपके विचारो और राय के माध्यम से मिलता रहेगा येसी आशा है और मुझे मार्गदर्शन भी मिलता रहेगा सभी अनुभवी लेखको के द्वारा. इसी इच्छा के साथ - प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल)

शुक्रवार, 28 मई 2021

साहित्य के सफर में - एक वार्ता


२७ मई २०२१ को अजय श्री टाइम्स के फेसबुक पेज पर एक वार्ता 

 

देखने सुनने का अवसर मिले तो जरुर किल्क करें - शुभम 
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आपका सहयोग - आपके विचारो और राय के माध्यम से मिलता रहेगा येसी आशा है और मुझे मार्गदर्शन भी मिलता रहेगा सभी अनुभवी लेखको के द्वारा. इसी इच्छा के साथ - प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

बुधवार, 26 मई 2021

पर्यावरण प्रेमी श्री रामप्रसाद बडथ्वाल – एक परिचय




पर्यावरण प्रेमी श्री रामप्रसाद बडथ्वाल – एक परिचय 

१२ मार्च १९४४ को जन्मे श्री रामप्रसाद बड़थ्वाल – एक पर्यावरण प्रेमी जिन्होंने अधिकतम समय पर्यावरण को समर्पित किया है. पिछले कई वर्षो से वे पर्यावरण के पर्याय है. बिना नाम की लालसा लिए वे हजारो की तादाद में वृक्षारोपण कर प्रकृति से प्रेम व् पर्यावरण सरंक्षण का सन्देश को लोगो तक पहुंचा रहे है.  

फलपट्टी के नाम से मशहूर कांडी खंड गाँव में  स्व श्री रघुबर दत्त के परिवार में तीन पुत्र श्रद्धेय मुकंद राम बड़थ्वाल देवेज्ञ, श्री उरमिदत्त और श्री राधाकृष्ण है. प्रकृति प्रेमी रामप्रसाद जी राधाकृष्ण जी के पुत्र है.  

परिवार में स्व श्री देवेज्ञ जी सभी के प्रेरणा श्रोत रहे है और रामप्रसाद जी ने भी सोचा कि मैं भी कुछ ऐसा कार्य करूं जिससे हम राज्य के विकास में एक प्रमुख भूमिका निभा सके. वर्ष १९७२ में गढ़वाल से पलायन की शुरुआत हो चुकी थी. उनकी माता जी के निधन के उपरांत  उनके खेत खलिहान सब खाली और सूखे – गढ़वाली भाषा में जिसे “बांज/बजर पोड गीन” बुल्दीन. तब इन्होने वृक्षारोपण की बात सोची. अपने चचेरे भाई महिमानंद  के साथ मिलकर कांडी (गंगा किनारे के क्षेत्र)  में दिवाल बंदी कर 300 गड्ढे खोदकर उसमे कलजी नीम्बू के पेड़ लगाये. इस सफल प्रयोग से वे खुश भी हुए और मन ही मन निश्चय भी किया वे इसे अपना मिशन भी बनायेंगे. उनकी प्रेरणा से कई लोगो ने इस पर काम कानर शुरू किया. अध्यापक सत्याप्रस्द बड़थ्वाल ने भी इसी प्रेरणा से लेकर गाँव में आम केले अंगूर कटहल बांज आदि के सैकड़ो पेड़ लगाये.  कुछ समय तक ही वे यह कार्य कर पाए. ( अभी इस जगह पर उनके भतीजे विनोद गेस्ट हाउस चलाते है ) 

रोजगार की तलाश के लिए वे मुंबई भी गए. यहाँ उन्होंने टैक्सी चलाई, वर्कशॉप में काम  किया. और वहां से उन्हें ओमान जाने का मौका मिला. जिसमे वे एक साल तक ड्राइवर का कार्य करते रहे. इसके साथ ही उन्होंने अरबी बोलना सीखा और सेल्समेन की नौकरी करने लगे.  लेकिन पेड़ो सा उनका प्रेम यहाँ भी उन्हें रोक नहीं पाया. रेगिस्तान में अपने घर के आंगन में बकरी की लीद से रेतीली भूमि को उर्वरक बनाकर भिन्डी, मिर्च बैंगन इत्यादि सब्जियां उगाने लगे. इसे देख वहां के ओमानी अचम्भित हुए. उन लोगो ने उन्हें आग्रह किया कि वे उनके घरो में भी इसी तरह के पेड़ चाहते है. रामप्रसाद जी ने उनके घरो में जाकर खेती तैयार करना सिखाया. तब लोगो ने वहां भी नीम्बू, बेर, अमरुद व् आम के बगीचे लगाये. रामप्रसाद जी ने वहां ओमानियो को हरियाली और वृक्षारोपण का सन्देश दिया. 

रामप्रसाद जी १९९५ में ओमान से स्वदेश लौटे. उन्होंने अब वृक्षरोपण को अपना लक्ष्य बना लिया. ऋषिकेश में उनके घर के आस व् अन्य क्षेत्रो में पर्यावरण सरंक्ष्ण के लिए पौधारोपण को प्रमुख मान कर लोगो को सन्देश देना शुरू किया. जहाँ कहीं उन्हें स्थान दिखाई देता वे पेड़ लगा देते. अनजान  लोगो के घरो में भी पेड़ लगा आते थे. अपनी जेब के खर्चे से बरसत में वे अधिक पेड़ लगते थे.   देखते देखते वे समाज में ‘ग्रीनमैन’ नाम से चर्चित हो गए.निजी खर्च पर फलदार पौधे लगाना और लोगो में बाँटना ही उनका कर्म बन गया. वे जब भी अपनों के या रिश्तेदारों के यहाँ जाते तो पौधा लेकर ही जाते और उन्हें पर्यावरण सरंक्षण का सन्देश देते. 

वृक्षारोपण के कई अभियानो की शुरआत इन्होने की है.  कई संस्थाओ व् विद्यालयों के लोग इनको वृक्षरोपण व् पर्यावरण सरंक्षण के कार्यक्रम में बुलाते है. कई सम्मान कई संस्थाओ द्वारा इन्हें प्राप्त है. हर वर्ष इसके लिए वे अपना लक्ष्य निर्धारित करते थे.  पर्यावरण संतुलन के लिए वे मानते है की वृक्षों का संरक्षण आवश्यक है. 

कुछ वर्ष पूर्व एक सडक दुर्घटना में रामप्रसाद जी घायल हो गए थे जिस कारण पाँव की चोट उन्हें आज चलने फिरने में दिक्कत करती है. वो घर - घर जाने में असमर्थ है पर लोग उन्हें पहचानते है और घर से ही पौधे ले जाते हैं.  उनके इस सेवा भाव से खुश होर्टीकल्चर विभाग  वाले भी अब पौधे इनके यहाँ छोड़ जाते है और लोग इनके घरो से पौधे ले जाते हैं. 

वृक्षमित्र बडथ्वाल जी मानते है कि वनों के प्रति उपेक्षात्मक व्यवहार ही प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोतरी का कारण है. आज जो प्रकृति में बदलाब देखने को मिला रहा है वह मनुष्य हस्तक्षेप के कारण है. पर्यावरण की स्वस्थता के लिए पौधों का सरंक्षण व् संवर्धन वे अनिवार्य समझते है.

प्रकृति प्रेमी / वृक्ष मित्र श्री रामप्रसाद जी को बड़थ्वाल कुटुंब के सदस्य उनके इन प्रयासों के लिए हार्दिक बधाई व् शुभकामनाये देते है. आशा है आपसे प्रेरित होकर और भी इस अभियान को चलाएंगे व् पर्यावरण सरंक्षण द्वारा प्रकृति का संतुलन बनाने में अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे – शुभम 

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

( श्री रामप्रसाद बडथ्वाल जी से बातचीत व् हेमलता बहन द्वारा दी जानकरी पर आधारित )  
  
   



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सोमवार, 17 मई 2021

डॉ पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल – राष्ट्रवंदन अतीत का अभिनंदन

डॉ पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल राष्ट्रवंदन अतीत का अभिनंदन

१६ मई २०२१

आदरणीय अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष हिंदी साहित्य भारती श्री रविन्द्र शुक्ल जी, केन्द्रीय महा मंत्री डॉ अनिल जी, उत्तराखंड हिंदी साहित्य भारती के अध्यश श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी, श्रधेय डॉ बुड़ाकोटी जी, आज के कार्यक्रम की सयोजिका डॉ कविता जी, सह सयोजिका सुश्री निधि जी, सरस्वती वंदना व् मातृवदना को स्वर देने वाले श्री दिनेश चन्द्र त्रिपाठी जी व् श्री रोशन बलूनी जी सहित सभी उपस्थित सुधिजनों का हार्दिक अभिनंदन।, मेरा प्रणाम स्वीकार करे.

मुझे अत्यधिक प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है कि हिंदी साहित्य भारती  द्वारा  राष्टवंदन, अतीत का अभिनंदन  कार्यक्रम के अंतर्गत हिंदी के प्रथम शोध छात्र व्  प्रथम डी लिट् की उपाधि पाने वाले डॉ पीताम्बर बड़थ्वाल जी पर यह कार्यक्रम है. ख़ुशी इसलिए भी कि यदि मेरे अंदर हिंदी के प्रति प्रेम का भाव जन्मा है उसमें कुछ प्रेरणा उनके कृतित्व से ही मिली है.  डॉ बड़थ्वाल जी से मेरा सीधा रिश्ता नहीं परन्तु पारिवारिक सम्बन्ध है. बचपन में फूफू ( डॉ बड़थ्वाल जी की पुत्रियों ) लोगो को आना जाना था और अक्सर घर में डॉ बड़थ्वाल जी के बारे में भी बात होती थी. लेकिन बचपन में उनकी शख्सियत से परिचय न था. एक बार एक पुस्तक हमारे घर आई मध्य हिमालय में शिक्षा व् शोध, जो पिताजी माता जी को भेंट मिली थी. एक दिन पुस्तक उठाई खोली तो पुस्तक के सम्पादक जुयाल जी ने उसे डॉ बड़थ्वाल को समर्पित किया था उनकी फोटो भी थी. तब थोड़ी जिज्ञासा हुई उन्हें जानने की. फिर हलकी फुलकी जानकारी मिली पापा जी और माँ से. उनके बारे में जानने का हमेशा मन में रहा. कभी कभी फूफू लोगो से पता चलता... लेकिन फिर बात आई गई हो गई.

युवा अवस्था तक मेरा हिंदी से केवल छुटपुट लिख कर छोड़ देना ही नाता था. पढ़ाई हुई हिंदी विषय न था साइंस और फिर मैं १९८७ में वदेश चला गया. तब अकेलपन को दूर करने हेतु मैंने अपने युवा अवस्था के पुराने शौक - कविता  लिखना शुरू किया. तब डॉ बड़थ्वाल जी के बारे में पुन: जानने की इच्छा प्रबल हुई- खोज की, नेट पर कहीं भी एक दो जगह छोड़ कर  कोई ख़ास जानकारी हासिल न हो पाई. आश्चर्य भी हुआ की हिंदी का प्रथम शोध विद्यार्थी व् प्रथम हिंदी डिलीट के बारे क्यों विस्तार नहीं मिला. जब पहले फूफू लोगो से बात होती थी तो यह पता लगा कि वे लोग भी असमर्थ रहे प्रचार प्रसार करने व् उनके कई कार्यो को सरंक्ष्ण देने में. यह भी पता लगा कि कई लोग आते जाते थे और क्या क्या लेकर जाते थे पता ही नहीं था.  खैर तब मैंने कुछ कार्य इस पर शुरू किया और जानकरी समेट कर ब्लॉग लिखा जिसे उस वक्त कई डिजिटल प्लेटफोर्म पर, समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाया. जो सामान्य जानकरी डॉ बड़थ्वाल जी के बारे में या फोटोज आपको नेट में मिलेंगी यह उसका ही हिस्सा है.  

हिन्दी के प्रथम शोध विद्यार्थीप्रथम डी लिटसफल अन्वेषकनिबंधकारअध्यापक व साहित्य के मर्मज्ञ श्रद्धेय डॉ बड़थ्वाल जी को याद करते हुये उनकी समृति में पुष्पांजलि अर्पित करता हूँ.

डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल जी का जन्म १३ दिसम्बर १९०१ तथा मृ्त्यु २४ जुलाई १९४४ दोनो ही पाली ग्राम कोडिया पट्टीपौडी गढवाल, उत्तराखंड में हुई. उनके पिताजी  पंडित गौरीदत्त बड़थ्वाल ज्योतिष व् कर्मकांडी ब्राह्मण थे. डॉ बड़थ्वाल जी का संस्कृत बोध शायद उसकी का नतीजा रही. १० वर्ष की उम्र में ही उनके पिताजी का देहांत हुआ तब उनके ताऊ जी स्व श्री मनीराम बड़थ्वाल जी ने उनका लालन पोषण किया. प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में हुई. फिर मैट्रिक हाईस्कूल की शिक्षा श्रीनगर व् लखनऊ में हुई. कानपुर आकर उन्होंने इंटर की परीक्षा पास की.. कानपुर में ही उन्होंने गढ़वाल के छात्रो का एक संगठन भी बनाया और उसी दौरान  हिल्मैन नामक अंग्रेजी पत्रिका में कहानियां लिखी व संपादन किया.

इंटर के पश्चात् उन्होंने बनारस हिन्दू विश्विधालय में प्रवेश लिया. लेकिन यहाँ स्वाश्थ्य ने उनका साथ नहीं दिया. लौट कर वे पाली आये. तभी उनके ताऊ जी का भी निधन हो गया. लगभग दो वर्ष पाली ही में रहे  इसी दौरान पुरुषार्थ मासिक पत्रिका में  उन्होंने "अंबर" नाम से कविताये लिखी. तत्पश्चात १९२४ में बनारस आये, १९२६ में बीए की परीक्षा पास की.  तब श्याम सुन्दर दास हिंदी विभाग अध्यक्ष थे. डॉ बड़थ्वाल जी ने १९२८ में एम् ए  किया. उनका छायावाद पर निबंध श्यामसुन्दर दास जी को बहुत पसंद आया और उन्होंने बड़थ्वाल जो को इस पर शोध के लिए चुना. बड़थ्वाल जी ने १९२९ में एल एल बी परीक्षा भी पास की, यही पर डॉ बड़थ्वाल जी की हिंदी विभाग में प्रध्यापक के तौर पर हुई नियुक्ति हुई.  उनके शोध कार्य, प्रतिभा,  निष्ठा व् ईमानदारी को देखते हुए काशी नागरी प्रचारणी सभा ने उन्हें संचालक भी बनाया. १९३१ में उन्होंने अपना शोध प्रबंध किया उस वक्त शोध परीक्षक टी ग्राहम वैली थे और उन्होंने उन्हें पी एच डी के लिए उपयुक्त माना. कुछ संशोधन के साथ डॉ बड़थ्वाल ने शोध (अंग्रेजी में) को प्रस्तुत किया व् १९३३ दीक्षांत समरोह में उन्हें में उन्हें हिंदी में प्रथम डी लिट् पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.

डॉ० बड्थ्वाल ने हिन्दी में शोध की परंपरा और गंभीर अधय्यन को एक मजबूत आधार दिया आचार्य रामचंद्र शुक्ल और बाबू श्यामसुंदर दास जी के विचारो को आगे बढाया  हिन्दी आलोचना को आधार दिया. वे उत्तराखंड की ही नहीं भारत की शान है जिन्हें देश विदेशो में सम्मान भी मिला. उत्तराखंड के लोक -  साहित्य (गढ़वाल) के प्रति भी उनका अत्यधिक प्रेम था.

उनका आध्यातमिक रचनाओं की ओर लगाव था जो उनके अध्ययन व शोध कार्य में झलकता है. उन्होंने संस्कृतअवधीब्रजभाषाअरबी एवं फारसी के शब्दों और बोली को भी अपने कार्य में प्रयोग किया. उन्होने संतसिद्घनाथ और भक्ति साहित्य की खोज  विश्लेषण में अपनी रुचि दिखाई और अपने गूढ़ विचारो के साथ इन पर प्रकाश डाला. भक्ति आन्दोलन (शुक्लजी की मान्यता ) को हिन्दू जाति की निराशा का परिणाम नहीं माना लेकिन उसे भक्ति धारा का विकास माना. उनके शोध और लेख उनके गम्भीर अध्ययन और उनकी दूर दृष्टि के भी परिचायक हैं उन्होने कहा था "भाषा फलती फूलती तो है साहित्य में अंकुरित होती है,  साधारण बोलचाल पर बोली मँज-सुधरकर साहित्यिक भाषा बन जाती है."  जैसा की पहले कहा वे दार्शनिक व्यक्तित्व के धनीशोधकर्तानिबंधकार व समीक्षक थे और उनके निबंध/शोधकार्य को आज भी शोध विद्दार्थी प्रयोग करते है. उनके निबंध का मूल भाव उसकी भूमिका या शुरुआत में ही मिल जाता है.

कबीररामानन्द और गोरखवाणी पर डॉ० बडथ्वाल ने बहुत कार्य किया और इसे बहुत से साहित्यकारो ने अपने लेखो में और शोध कार्यो में शामिल किया साथ ही उनके कहे को पैमाना मानयह अवश्य ही चिंताजनक है कि सरकार और साहित्यकारो ने उनको वो स्थान नही दिया जिसके वे हकदार थे प्रयाग विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर डा॰ रानाडे भी कहा कि “यह केवल हिंदी साहित्य की विवेचना के लिये ही नहीं अपितु रहस्यवाद की दार्शनिक व्याख्या के लिये भी एक महत्त्वपूर्ण देन हैउन्होने बहुत ही कम आयु में इस संसार से विदा ले ली अन्यथा वे हिन्दी में कई और रचनाओ को जन्म देते जो हिन्दी साहित्य को नया आयाम देतेडॉ० संपूर्णानंद ने भी कहा था कि यदि आयु ने धोखा न दिया होता तो वे और भी गंभीर रचनाओं का सर्जन करते.

उन्होने संतसिद्घनाथ और भक्ति साहित्य की खोज और विश्लेषण में अपनी रुचि दिखाई और अपने गूढ विचारो के साथ इन पर प्रकाश डाला.  " हिन्दी काव्य मे निर्गुणवाद" ('द निर्गुण स्कूल आफ हिंदी पोयट्री' - जो उन्होने श्री श्यामप्रसाद जी के निर्देशन में किया था).  डॉ बड़थ्वाल ने अपने शोध में सपष्ट किया कि हिन्दी संत काव्य में शून्यवादयोगसाधना व गुरु का तत्व महत्वपूर्ण है.  उन्होने अनमोल संत साहित्यों को आत्मसात किया. निर्गुण साहित्य की रचना व आध्यत्मिक रहस्यवाद का सृजन किया तभी संत साहित्य राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पटल पर दृष्टीगोचर हुआ.

डॉ बड़थ्वाल जी ने अपने शोध के लिए निर्गुण संप्रदाय के कवियों पर सुव्यवस्थित ढंग से विचार किया है. उनके  उपदेशोकाव्यों को अध्ययन कर भारतीय संस्कृति को समझने में सहायक रूप प्रदान किया है. उन्होने माना है कि संतो की सुसंगत विचारधारा को एक विशिष्ट पद्धति का रूप दिया जा सकता है. निर्गुण पंथनिर्गुणधारा का उदय वे सांप्रदायिकता के विरुद्ध ही मानते थे. अँग्रेजी - हिन्दी साहित्य सांख्ययोग व वेदान्त के विद्यार्थी डॉ बड़थ्वाल का मानना था कि चिंतन के क्षेत्र का ब्रह्मवाद जब काव्य कि संगत मे आता है तो कल्पना और भावुकता का आधार पाकर वह रहस्यवाद कि श्रेणी में आ जाता है.

"नाथ सिद्वो की रचनाये " मे ह्ज़ारीप्रसाद द्विवेदी जी ने भूमिका में लिखा है.

"नाथ सिद्धों की हिन्दी रचनाओं का यह संग्रह कई हस्तलिखित प्रतियों से संकलित हुआ है इसमें गोरखनाथ की रचनाएँ संकलित नहीं हुईंक्योंकि स्वर्गीय डॉ० पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ की रचनाओं का संपादन पहले से ही कर दिया है और वे ‘गोरख बानी’ नाम से प्रकाशित भी हो चुकी हैं. बड़थ्वाल जी ने अपनी भूमिका में बताया था कि उन्होंने अन्य नाथ सिद्धों की रचनाओं का संग्रह भी कर लिया हैजो इस पुस्तक के दूसरे भाग में प्रकाशित होगा दूसरा भाग अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है अत्यंत दुःख की बात है कि उसके प्रकाशित होने के पूर्व ही विद्वान् संपादक ने इहलोक त्याग दिया डॉ० बड़थ्वाल की खोज में 40 पुस्तकों का पता चला थाजिन्हें गोरखनाथ-रचित बताया जाता है डॉ० बड़थ्वाल ने बहुत छानबीन के बाद इनमें प्रथम 14 ग्रंथों को निसंदिग्ध रूप से प्राचीन मानाक्योंकि इनका उल्लेख प्रायः सभी प्रतियों में मिला तेरहवीं पुस्तक ‘ग्यान चौंतीसा’ समय पर न मिल सकने के कारण उनके द्वारा संपादित संग्रह में नहीं आ सकी. परंतु बाकी तेरह को गोरखनाथ की रचनाएँ समझकर उस संग्रह में उन्होंने प्रकाशित कर दिया है

डा० बड़थ्वाल ने अपने निबंध में भी संतों के भाव अथवा विषय को ही प्रधानता दी है और उनकी भाषा को गौण स्थान प्रदान किया है. उन्होने संतो कि रचनाओ को भावभिव्यक्ति का एक साधन माना है. संतो के सिद्धांतों साधनाओ और विशेषताओं उबार दिया है. उनका कहना था कि आत्मा जब सृजन कि लहर के अधीन पड़कर स्थूल माया का भोग करती है तो तब वह उरम या उर्मि है। तन और मन के सयुंक्त योग से साधक को अखंड संपूर्णता का अनुभव होता है.

योगमार्गी संतो और विशेषकर कबीर के रहस्यवादउनके सबद और साखी पर उनके व्यक्तव्य से बहुत से साहित्यकार परिचित थे. वे केवल हिंदी ही नहीं अंग्रेज़ी साहित्य के विद्वानो में वे बहुत चर्चित थे.  डॉ बड्थ्वाल जी ने अपने गुरुओं के साथ हिन्दी की पाठ्यपुस्तके भी तैयार की. साहत्यिक निबंधो के सृजन और भाषा पर उनकी पकड़  अतुलनीय थी.

डॉ बड़थ्वाल जी हिंदी साहित्य में वो नाम था जिसका सब मान करते थे. एक बार राष्ट्रीय कवि के चयन के लिए गणेश बाग़वाराणसी में महात्मा गाँधी जी की अध्यक्षता में मीटिंग हुई. जिसमे मैथली शरण गुप्त जी को राष्ट्रीय कवि घोषित किया गया.  उस मीटिंग में डॉ बड़थ्वाल जी भी उपस्थित थे और गुप्त जी के नाम के प्रस्तावको में से एक थे.

उनकी बहुत सी रचनाओ में से कुछ एक पुस्तके "वर्डकेट लाईब्रेरीके पास सुरक्षित है. हिन्दी साहित्य अकादमी अब भी उनकी पुस्तकें प्रकाशित करती है लेकिन उन पर कई प्रश्न भी खड़े है, किसने कार्य किया किसके नाम से छपी इत्यादि - इत्यादि. इसका अकादमी सहित साहित्य जगत को संज्ञान लेना चाहिए. यह चर्चा का मुद्दा है तो फिर कभी इस पर बात होगी.  

डॉ बड़थ्वाल जी को नमन करते हुये यही कहना चाहूँगा और मेरा मानना भी है कि डॉ बड्थ्वाल जी के कई अप्रकाशित साहित्य को निहित स्वार्थ के लिए प्रयोग किया या नष्ट किया गया है. आज साहित्य के पहरेदारों से निवेदन भी है कि भारत में हिन्दी शोध के प्रथम डी लिट को उचित सम्मानउनके निवास को शोध - संस्थान के रूप में व उनके अप्रकाशित साहित्य को सामने लाने का भरसक प्रयास किया जाना चाहिए.

हिंदी के इस पुरोधा को नमन करते हुए और हिंदी साहित्य भारती का पुन: अभिनंदन करते हुए अपनी बात को समाप्त करता हूँ. धन्यवाद .

यूं ट्यूब पर कार्यक्रम  



आपका सहयोग - आपके विचारो और राय के माध्यम से मिलता रहेगा येसी आशा है और मुझे मार्गदर्शन भी मिलता रहेगा सभी अनुभवी लेखको के द्वारा. इसी इच्छा के साथ - प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

शनिवार, 15 मई 2021

श्रीधर बड़थ्वाल - एक परिचय




आज विश्व परिवार दिवस है – इसलिए हमारे लिए अच्छा मौका है परिवार की महत्ता को दर्शाता एक जीवन परिचय या कहे परिवार का परिचय. श्री राजेंद्र माणिकलाल बड़थ्वाल भाईसाहब जी द्वारा जो जानकरी प्राप्त हुई उसे आपके साथ साँझा कर रहा हूँ.
‘नौगाँव’ पट्टी मनारस्यूं नजदीक कल्जीखाल, वो बड़थ्वालो का गाँव है जिसमे आज केवल नागराजा का ही मंदिर शेष है. भाईसाहब के अनुसार यह उत्तराखंड का एकमात्र “रेवन्यू विलेज” है. लगभग सौ साल पहले इस गाँव को महामारी ने घेर लिया था तब सभी बड़थ्वाल बेड़गाँव में स्थान्तरित हो गए. इसी गाँव का एक परिवार १०० वर्षो से सयुंक्त परिवार के साथ रह रहा है. यह पंचतंत्र की कहानी की तरह शिक्षाप्रद है.
नौगाँव से पंडित बद्रीदत्त बड़थ्वाल जी भी बेडगांव आ गए थे. उन की दो संताने श्री राधाकृष्ण जी व् श्रीधर जी थे. दोनों भाई भी अपने पिता की तरह दानवीरता व् विद्धता के परिचायक थे. 40 वर्ष की उम्र में ही श्री राधाकृष्ण जी व् उनकी पत्नी का निधन हो गया. उनके दो बेटे (श्री माणिकलाल जी, श्री रामचंद्र जी) और दो बेटियों (सुश्री गोमती कुकरेती, बरसुडी व् सुश्री कृष्णा देवी थपलियाल, तंगोली) की जिम्मेदारी को छोटे भाई श्रीधर प्रसाद जी ने अपने तीन बेटों ( श्री सत्यप्रसाद जी, श्री मोहनलाल जी व् श्री रेवतीनंदन शास्त्री) की जिम्मेदारी के साथ बखूबी निभाया. सभी को उच्च शिक्षा देकर जिम्मेदार नागरिक बनाया. सभी ने अपनी कार्य कुशलता से पारिवार में सहयोग व् योगदान दिया.
श्रीधर प्रसाद बड़थ्वाल ( १९०४ - १६.७/१९८०) जी कई वर्षों तक ग्राम प्रधान रहे. दूर - दूर तक उनके नाम की ख्याति थी. उन्हें कर्मकांड ज्योतिष में महारथ हासिल थी. ज्योतिष बिरादरी में लोग उनके नाम की मिशाल दिया करते थे. आस पास के ५ गाँवों की बिरती उनकी थी. उनकी दी हुई शिक्षा पर उनके परिवार वाले आज भी अमल करते है. वे कहा करते थे की अपने को उठाने के लिए दूसरे को नीचे मत गिराना, बिना पंचायत के अपनों की मदद /सहायता करो, बड़ा वही जो दूसरे को छोटा न समझे और रिश्ते निभाना सीखिए उनसे शिकायत मत कीजिये.
वर्षो पहले श्रीधर जी द्वारा लगाया परिवार का ये वट वृक्ष आज विशाल रूप में है. तीसरी पीढ़ी में उनके ८ नाती, ५ नातिन और चौथी पीढ़ी में १५ परनाती व् १० परनातन है. जो आज भी उसी प्रेमभाव और सेवाभाव से जीवन यापन कर रहे है. आज जीविका के लिए परिवार जहाँ भी बसा हो लेकिन पारिवारिक जुड़ाव जस का तस है व् पूजा हेतु परिवार साथ गाँव जाता है.
हम सब श्रीधर बड़थ्वाल जी की स्मृति नमन करते है. हम सब बड़थ्वाल बंधु परिवार की महत्ता को समझे इस बड़े परिवार “बड़थ्वाल कुटुंब” के साथ जुड़ कर एक नई सोच के साथ मिलकर चले – शुभम
- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल



(आपका सहयोग - आपके विचारो और राय के माध्यम से मिलता रहेगा येसी आशा है और मुझे मार्गदर्शन भी मिलता रहेगा सभी अनुभवी लेखको के द्वारा. इसी इच्छा के साथ - प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल)

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

हरीश बड़थ्वाल - एक परिचय


हरीश बड़थ्वाल - एक परिचय 

बचपन से लेकर जब तक मैं भारत में था तो कई बड़थ्वाल लोगों से परिचय मेरा रहा. अपने सैंज, सिराई, जोली (हमारे गांव के आसपास) के अलावा जो गांव उस वक्त मुझे मालूम थे, वे थे: पाली तल्ली, बडेथ, बुडोली, खंड और क्यार. कारण मेरे पिताजी का उस गांव के लोगो से किसी न किसी प्रकार का सम्बन्ध. उनमें से एक गांव "खंड"  (देवप्रयाग के निकट, कांडी, दाबड़, अमोला से घिरे, पौड़ी जनपद में). खंड से स्व. तीर्थानंद बड़थ्वाल ताऊ जी का पिताजी से प्रेम व अपनत्व ही आज उनकी याद उनके चेहरे को जस का तस मेरी आंखों में बसाये हुए है. आज कई बरसों बाद आज मुझे फेसबुक व इस समूह के जरिये उन्हें याद करने का मौका मिल रहा है. उनकी स्मृति को प्रणाम करता हूँ. याद का कारण कि यहां तीर्थानन्द ताऊ जी के सुपुत्र श्री हरीश बड़थ्वाल भाई साहब' से मिलना हुआ कई वर्षों बाद. तो आइये आपकी मुलाकात हरीश भाई साहब से करवा दी जाए क्योंकि लेखन - ब्लागर (हिंदी व अंग्रेजी) जगत में यह नाम प्रमुखता से लिया जाता है और लोग इन्हें शौक से पढ़ते हैं. 

हरीश भाई जी का जन्म खंड में ही हुआ. लिखने का शौक उन्हें अपने पिताजी स्व. तीर्थानन्द जी से जैसे विरासत में मिला हो. ताऊ जी ने साधारण आय होने पर भी सभी बच्चों को नौकरी तलाशने के बदले जीवन को संस्कारों, निष्ठाओं और मूल्यों से संवारने, निखारने की प्रेरणा दी - घर में सुख-सुविधाओं से समझौता भले ही हो जाता किंतु पढ़ाई के खर्चों में उनका हाथ नहीं भिंचता था. परिवार में छोटा भाई जीएसआई से निदेशक बतौर सेवानिवृत्त हुए, तीन बहनों में दो (दिवंगत) क्रमशः दिल्ली शिक्षा निदेशालय से प्रिंसीपल और एयर फोर्स स्कूल से वरिष्ठ अध्यापक रहीं. तीसरी एमिटी इंटरनेशलन नॉएडा में वरिष्ठ अध्यापिका हैं. बेटी सिलोगी और बेटे उत्कृष्ट दोनों में स्नातकोत्तर शिक्षा से बढ़ कर निरंतर पढ़ने-सीखने की उत्कंठा है. हरीश भाई साहब की धर्मपत्नी नीलम जी अध्यापिका हैं.

हरीश भाई जी ने दिल्ली, कोलकाता, भोपाल, करनाल शहरों में अनेक सरकारी, अर्ध-सरकारी व निजी संगठनों के जिम्मेदाराना संपादकीय पदों पर करीब 40 वर्षो तक कार्य किया. देहरादून के दैनिक (अंग्रेजी) टैब्लॉयड में दो वर्ष तक तथा दिल्ली के (हिंदी) दैनिक वीर अर्जुन में छह वर्ष तक रविवारी कॉलम लिखे. राष्ट्र स्तरीय हिंदी-अंग्रेजी अखवारों में उनके 700 से अधिक आलेख अध्यात्म, बेहतर जीवन, स्वास्थ्य, व्यंग्य आदि विषयों पर प्रकाशित हो चुके हैं. 

उनके कार्य क्षेत्र पर नज़र डाले तो:
  • मैसर्स कुटीर उद्योग समाचार, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली;
  • सेन्ट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ़ एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग (ICAR), भोपाल (मध्य प्रदेश); सेन्ट्रल सॉइल सेलिनिटी रिसर्च इंस्टिट्यूट (ICAR), करनाल (हरियाणा);
  • डाइरेक्टोरेट ऑफ़ एडल्ट एजूकेशन, शिक्षा विभाग, भारत सरकार, दिल्ली  
  • एंथ्रोपोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया, संस्कृति विभाग, भारत सरकार, कोलकत्ता (पश्चिम बंगाल);
  • नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ पब्लिक कोऑपरेशन एंड चाइल्ड डेवेलपमेंट, नई दिल्ली.

संपादन 
  • SAIL न्यूज; (आईटीसी का) 'पुकार';
  • इन्डियन हार्ट जरनल;
  • नर्सिंग जरनल आफ इण्डिया;
  • इनसाईक्लोपिडिया ऑफ़ मेनेजमेंट एंड इकोनोमिक साइंसिंज़.

अखबारों में
अंग्रेजी - हिंदुस्तान टाइम्स, डैक्कन हेराल्ड, द न्यू इन्डियन एक्सप्रेस, दि ट्रिब्यून, ओड़िसा पोस्ट, हंस द इंडिया, दि हितवाद, असम ट्रिब्यून, इकोनोमिक्स टाइम्स, द पाईनियर, पैट्रियट, नेशनल हेरल्ड.

हिंदी - नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक ट्रिब्यून, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, दैनिक विश्वमित्रा, सन्मार्ग, डेली मिलाप इत्यादि.

ब्लंटस्पीकरडाटकाम (www.bluntspeaker.com ) नाम से उनका (हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित) ब्लॉग है. सामयिक विषयों पर उनकी स्पष्टता व ज्ञान, उनके लेखन को एक अलग श्रेणी में खड़ा करते हैं.  जब आप इस ब्लॉग पर जायेंगे तो आप उनके विस्तृत लेखन, विषय पर उनकी पकड़ और बेबाक राय से परिचित होंगे. 

हरीश बड़थ्वाल भाई जी पर हम सभी को गर्व है और उन्हें शुभकामनाएं प्रेषित करते हैं.  

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

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गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

श्री गदाधर बड़थ्वाल जी - एक परिचय


(३१ दिसम्बर १९१५ - २८ अगस्त २००८ )

(३१ दिसम्बर १९१५ - २८ अगस्त २००८ )

उत्तराखंड के पौड़ी जिले  में कंडोलिया के निकट 'बुडोली' गाँव में ३१ दिसम्बर १९१५ को जन्मे श्री गदाधर बड़थ्वाल जी साधु, सात्त्विक, पूर्णतः आध्यात्मिक वृत्ति के मित्भुक्, सहज और नेक व्यक्ति थे.

श्री गदाधर जी के माता-पिता अल्पायु में चल बसे. उनकी फूफू ने उनका लालन-पालन किया. समय उनके साथ न था और जल्द ही फूफू भी उन्हें छोड़कर चल बसीं. गरीबी इतनी थी कि संस्कार के लिए साधन न होने पर श्रीनगर के निकट गंगा में ही उन्हें विसर्जित करना पड़ा.

वे बाल्यकाल से कर्मठ, जुझारू व खुद्दार थे। इसका अंदाजा इस एक घटना से लगाया जा सकता है. जब गांव में पेयजल टैंक की मरम्मत के लिए सीमेंट आदि मंगवाने के लिए दुगड्डा जाने को कोई तैयार नहीं था तो वे अकेले ही (करीब 25 मील एक ओर) पैदल चल पड़े. उन दिनों यही चलन था, और रात तक लौट भी आए. इस साहसिक कार्य के लिए प्रशासन ने उन्हें टैंक चालू होने के समारोह में शील्ड से सम्मानित किया था.

आरंभिक शिक्षा से वंचित श्री गदाधर ने अपने जुझारू व्यक्तित्व व् कुछ करने के हौसले से ज्योतिष का अनौपचारिक किंतु प्रकांड ज्ञान अर्जित कर ख्याति पाई. जन्मपत्री की सटीक विवेचना तथा भविष्यवाणियां सही उतरने पर उनके अनेक शिष्य और भक्त हो गए थे.

करीब ३५ वर्ष की आयु में, उच्च चरित्र के प0 गदाधर ने अन्न को तिलांजलि दे दी. उसके पश्चात् उनका अतिसीमित दैनिक आहार सिर्फ दो-ढ़ाई सौ ग्राम उबली पालक या अन्य पत्तेदार सब्जी, थोड़ा दूध या कोई एक फल ही रहा. अपने जीवन काल मे कभी भी औषधि का प्रयोग नहीं किया था, यहाँ तक कि सर्प दंश के बावजूद भी वह स्वस्थ रहे. इसका एक मात्र कारण उनका ४२ साल तक नमक़ का सेवन न करना था.

अंतकाल तक स्वस्थ रहना पोषण विज्ञानियों के लिए अवश्य ही कौतूहल का विषय होगा. उनकी आवश्यकताएं अंत तक नाम मात्र ही थीं. धोती, दो जूट के लंगोट, साफा, कंबल, एक जोड़ी खड़ाऊं और चश्मा उनके व्यक्तित्व की गवाही देने लगा. लंबी दूरियां पैदल तय करना उन्हें सुहाता था. उन्होंने जीवन के अधिकांश वर्ष हिमाचल के धर्मशाला और पठानकोट के आश्रमों में साधना व् अपने भक्तो के साथ बिताए।

पंडित गदाधर अंतकाल के परिवार में उनके तीन पुत्र हैं: सर्वश्री गिरिश, श्री रमेश, और श्री सुरेश। पहले पठानकोट में, शेष दो दिल्ली एनसीआर में। अंतिम दौर ( २८ अगस्त २००८ तक ) में उनका अधिकांश समय कनिष्ठ पुत्र श्री सुरेश के साथ बीता। उनके अनेक शिष्य व परिजन उनके निर्भीक, संयत आचरण और ज्ञान का गुणगान आज भी करते हैं।

हम सभी पं गदाधर जी की स्मृति में उन्हें प्रणाम व् पुष्पांजलि अर्पित करते है.

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( यह संक्षिप्त विवरण *श्री हरीश बड़थ्वाल* भाई साहब जी व् बाद में उनके पुत्र श्री सुरेश जी द्वारा जानकारी पर आधारित है. - अन्य जानकारी मिलने पर ब्लॉग में जोड़ दूंगा )

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

२९ अप्रैल २०२१


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शनिवार, 24 अप्रैल 2021

रोमिल बड़थ्वाल – एक परिचय


लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बड़थ्वाल (सेवानिवृत्त)



हिंदी, साहित्य, संस्कृति और धर्मनिष्ठा से जुड़े कुछ बड़थ्वालो से आपका परिचय करवाया. आज मुझे एक ऐसे व्यक्तित्व के बारे में जानने का अवसर मिला जो देश की रक्षा से जुड़ते हुए पर्वतारोहण ब एथलीट की दुनियां में आज एक मिसाल है. उत्तराखंड के ग्राम ‘खोला’ पट्टी कंडवालस्यूं के श्री बुद्धि बल्लभ के सुपुत्र लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बड़थ्वाल (सेवानिवृत्त) अपने फौजी पृष्ठभूमि, पारंगत क्षेत्र और व्यवसाय में किसी परिचय के मोहताज नहीं. लेकिन हम सबके लिए इस साहसी व्यक्तित्व को जानना और भी जरुरी हो जाता है कि वे बड़थ्वाल है.

13 पर्वतारोहण अभियान को नेतृत्व प्रदान करने वाले रोमिल बड़थ्वाल ने २२ वर्षो तक सेना में अपना योगदान दिया. अपने पर्वतारोहण अभियान का अंत उन्होंने मई २०१९ में माउन्ट एवरेस्ट पर फतह के साथ पूरा किया.

रोमिल बड़थ्वाल एक ट्रेकर, एक एंड्योरेंस-रनर और सुपररेंडोन्यूर  ब्रेवेट्स (साइकिलिंग) है. वे व्हाईट वाटर राफ्टिंग कोर्स के प्रतिष्ठित विशेषज्ञ है. विज्ञापन खेलो में भी रोमिल ने कोई कसर नहीं छोड़ी है. बजी जम्पिंग, कयाकिंग, पैरामोटरिंग, पैरासेलिंग, पैराग्लाइडिंग सहित साहसिक खेलों में सक्रिय रूप से प्रतिभागिता की है.

२ अक्टूबर १९७६ में जन्मे रोमिल 18 साल की उम्र में भारतीय सेना में भरती हुए. वे आज की अपनी सारी सफलताओं और माउन्ट एवरेस्ट के पर्वतारोहण अभियान नेतृत्व के पीछे भी सेना को श्रेय देते है. वे आज भारत के शीर्ष पर्वतारोहण कम्पनी “बूट्स & क्रेम्पोन्स” (B&C), के संस्थापक है

रोमिल राष्ट्र रक्षा अकादमी पुणे से स्नातक है. शैक्षणिक प्रदर्शन के दौरान वे कई पर्वतारोहण अभियान में असफल रहे, पेराट्रूपर बनना चाहते थे पर असफल रहे. लेकिन उन्होंने हिम्मत व् हौसला बनाये रखा. एम् टेक ( आई आई टी खडगपुर ) के दौरान उन्होंने खुद को पहचाना, कड़ी मेहनत से स्वयं को तैयार किया. अपने आत्मविश्वास को बनाये रखा. उनके पत्र अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों व् मेग्जींस में प्रकाशित भी हुए. इसी दौरान  रोमिल ने लंबी दूरी की दौड़, 10 किमी, हाफ मैराथन, मैराथन, साइकिलिंग सुपररेंडोन्यूर , हाफ आयरनमैन, राफ्टिंग इत्यादि में महारत हासिल की.

उपलब्धियां:

·         रोमिल बड़थ्वाल ने 2017 में दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित बोस्टन मैराथन में भागीदारी की.

·         ला अल्ट्रा, सुमुर से लेह तक वाया खारदुंगला पास (3500 मीटर की ऊँचाई पर) से सबसे कठिन उच्च ऊंचाई वाला अल्ट्रामैराथन है। रोमिल ने इसमें 111 किमी दौड़ के लिए गैर-लद्दाखी श्रेणी में टीम कप्तान और रिकॉर्ड धारक हैं।

·        नई दिल्ली स्टेडियम रन में 185 किमी की दूरी तय की

रोमिल पर्वतारोहण अभियानों में एक टीम लीडर के रूप में,  टीम के सदस्यों की सुरक्षा के नाते, पर्यावरण सरंक्षण, राष्ट्र के सम्मान को स्वयं के हितों से पहले रखते है। रोमिल कहते है कि माउंट एवरेस्ट के लिए, अपने मिशन के लिए मैं इस हद तक तैयार था कि अगर मैं उंगलियां या पैर की उंगलियों को खो देता तो भी परवाह न करता. रोमिल आज अपनी कम्पनी के द्वारा अनेको पर्वतारोहण के इच्छुको को ट्रेनिंग देते व् अभियान चलाते हैं. वे अफ्रीका, अर्जेंटीना, रूस, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल और भारत में कई अभियान चलाते हैं।

लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल, मैरून बेरेट वाला पैराट्रूपर, ओपी विजय और कारगिल का हिस्सा थे और कई वर्षों बाद  उन्हें 2019 में साहसिक खेलों में उत्कृष्ट योगदान के लिए 'द ईएमई ब्लू अवार्ड' से अलंकृत किया गया।

दो पुत्रियों ( १० वीं व् ५ वीं की छात्रा) के पिता रोमिल आई आई एम्, लखनऊ से मेनेजमेंट स्नातक है. एक महान प्रेरक वक्ता ( लगभग 100+ सभाए) और कई फिटनेस के लिए एक रोल मॉडल भी है. वे अपने माता पिता के साथ द्वारिका दिल्ली में रहते है. आजकल वे  नेपाल में पर्वतारोहण अभियान के साथ हैं.

हमारी ओर से रोमिल बड़थ्वाल व् परिवार को ढेर सारी शुभकामनायें. 


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रविवार, 18 अप्रैल 2021

तनहा अजमेरी - गुमनाम शायर ( एक परिचय )

संजय बड़थ्वाल - तनहा अजमेरी 


बड़थ्वाल – एक शब्द जो मुझे सदा उत्साहित करता है. यही कारण है कि मुझे हर उस व्यक्तित्व से जुड़ना अच्छा लगता है जिसके साथ बड़थ्वाल जुड़ा है क्योंकि वह मेरी जड़ो को मजबूती प्रदान करता है. जब मैं २००७ में बड़थ्वाल बंधुओं की तलाश में था उस वक्त लिखने का शौक भी था और कई लेखको, शायरों व् कवियों को पढता भी था. तभी एक नाम जो मेरी नजरो से गुजरा - तनहा अजमेरी. एक बेहतरीन शायर और शब्दों के जादूगर तनहा अजमेरी को पढ़ा तो जानने का प्रयास किया. मेरी ख़ुशी की सीमा नहीं रही जब मैंने पाया कि उस शख्स का नाम संजय बड़थ्वाल है. आप भी चौंक गए होंगे न ? खैर फिर उनसे परिचय बढाया बड़थ्वाल (Barthwal’s Around the World) समूह में जोड़ा. मेरा तो परिचय है ही उनसे, क्या आप जानते हैं? आइये मिलिए संजय बड़थ्वाल जी उर्फ़ तनहा अजमेरी जी से - कुछ मेरी कलम से कुछ उनकी जुबानी .. 


ज़िन्दगी सिर्फ वो ही नहीं जिसकी हर वक़्त चर्चा होती रहे
 “तनहा” किसी गोशे में सुकून से खुश रहना भी है ज़िन्दगी 
(गोशे=कोने) 

वैसे तो संजय जी कहते है कि मेरे बारे में जानने लायक, सचमुच, कुछ भी नहीं है। जो थोडा बहुत लिख लेता हूँ, वही मेरा परिचय बनकर रह गया है। लेकिन मैंने जाना है जो जाना है उसकी शुरुआत करता हूँ सन १९३९ की बात है जब पाली तल्ली से संजय जी के दादा जी स्व. मेजर मनीराम बड़थ्वाल जी कोटद्वार आ गए परिवार के साथ. मेजर मनीराम जी ब्रिटिश आर्मी में गढ़वाल के पहले चुने हुए आफिसर में से एक थे. नजीबाबाद रोड पर बडथ्वाल कोलोनी उनके नाम पर ही है. परिवार के लालन पालन हेतु संजय जी के ताउजी, चाचा जी व् पिताजी देश के विभिन स्थान पर रहने लगे. यह उत्तराखंड में पलायन के शुरआती दौर की बात होगी. संजय जी का मानना भी है कि यही वक्त था की हम अपनी जड़ो और पहाड़ से दूर हो गए या कहे - कट गए. 

संजय जी के एक ताऊ जी स्व मेजर सत्य प्रसाद बड़थ्वाल (शहीद १९६२ भारत चाइना वार) और दूसरे ताऊ जी श्री जगदम्बा प्रसाद बड़थ्वाल (एक्स जनरल मेनेजर, केनेडियन इंस्टीटयूट आफ बिजिनेस, ओंटारियो) संजय जी के पिताजी श्री शांति प्रसाद बड़थ्वाल जी अजमेर (राजस्थान) आ गए. वे कहते है कि पहाड़ से रिश्ता क्या टूटा की मरुस्थल से जा मिले. 

संजय जी के पिताजी स्व श्री नरेश ( शांति प्रसाद) सीआर पी ऍफ़ में कमान्डेंट की पोस्ट से रिटायर्ड हुए. संजय जी की दो छोटी बहिने है संगीता बड़थ्वाल खंडूड़ी ( स्कूल प्रिंसिपल, शिलोंग) और दीपाली बड़थ्वाल काला ( डायरेक्टर आफ एडुकेशन, स्ट्रेयर्ष यूनिवर्सिटी यूएसए). 

संजय बड़थ्वाल उर्फ़ तनहा अजमेरी का जन्म ३१ अक्टूबर १९६७ अजमेर में हुआ. प्रारम्भिक शिक्षा उन्होंने यहीं से प्राप्त की. वहीं पर शायरी के बीज चुन अल्फ़ाज़ के तमाम शजर (पेड़) लगाने का सिलसिला शुरु हुआ। अजमेर में पैदा होने कारण ही अपने उपनाम में उन्होंने ‘अजमेरी’ शब्द को जोड़ा. संजय जी की उच्च शिक्षा दिल्ली दिल्ली में सेंट स्टीफन कॉलेज में हुई. तनहा अजमेरी मानते है कि उन्हें नुकसान यह हुआ कि इन ५ वर्षों के दौरान वे धरातल से और दूर हो गए और आलम यह हुआ की न तो वे अंग्रेज बन पाए, न हिन्दुस्तानी रह गए. देश के रहे न परदेश के तो जीवन के भटकाव को ही जीवन बना लिया. कभी इधर कभी उधर, एक बहके हुए परिंदे कि मानिंद शजर से शजर। वे लिखते हैं 

अपनी धुन में जाने किधर से किधर निकल गए 
हम ऐसे मुसाफिर है जो मंजिलों को भी छल गए 

उन्हें नौकरियां मिलती रही और वे उन्हें छोड़ते रहे. कह सकते हैं कि किसी तरह उनका काम चलता रहा और ज़िन्दगी तमाम होती रही। तनहा अजमेरी जी कहना है कि एक चीज़ जो हमेशा साथ रही वो थी उनकी शायरी। इस पर वो कहते हैं कि ‘तनहा’ घूमते - घूमते हुजूम से अब ताल मेल बिठाना भूल गया हूं और वास्तविक व्यावहारिक गुफ्तगू से बिल्कुल परे हो गया हूं। 

संजय जी बताते है कि जहां तक कार्य का ताल्लुक है बहुत कोशिश की। सरकारी अफसर भी रहा, उकता गया। रोटी जब समस्या बनी तो कई प्राइवेट जॉब्स किए। TIMES OF INDIA, फिर इस्तीफा। अपने खुद के अखबार चलाए - "उत्तराखंड सवेरा" और "VOICE FROM HILLS". उच्च कोटि का काम करने की कोशिश की पर चाटुकारिता न जानने के अभाव के चलते विज्ञापन न मिले और निम्न कोटि के अखबार रसूखदार लोगों के सियासती CONNCETION के आगे अपने अखबार तो पटखनी खा गए। 

 संजय जी का स्वतंत्र रूप से लिखना जारी रहा - स्क्रिप्ट, बोल, कहानियाँ इत्यादि. मगर अंजाम वही- ढाक के तीन पात। मुंबई फिल्म उद्दयोग में जीरो कनेक्शन होने के कारण बात उनकी बात वहां भी नहीं बनी. वे कहते है कि ईर्ष्यालु लोगों ने आगे न बढ़ने दिया और मैं TALENT WITHOUT OPPORTUNITY की मिसाल बनकर रह गया। सो अब घर बैठे - बैठे ही अल्फ़ाज़ की माला पिरों रहा हूं। कहते हैं जंगल में मोर नाचा तो किसने देखा। परवाह नहीं। मोर का मज़ा तो नृत्य में है। मेरे तो यही हाल है... 

ना जाने किसी ओर निगाहें किये बैठा रहा है ज़माना
मेरी तो महज कुदरत के नज़रों में ही ज़िन्दगी रही 
होती होंगी औरों की इबादत देरों - हरम में तनहा 
मेरी तो फकत आशिक़ी ही ताउम्र मेरी बंदगी रही 

संजय बड़थ्वाल जी ने इस दौरान कुछ किताबें लिखी हैं – 
 - दायरों से बाहर(Poems), 
 - अफसाना बयानी(Short Stories), 
 - समंदर (Ghazals), 
-  गीत (Music and lyrics), 
 - अक्कड़ - बक्कड (बच्चों की कविताएं), 
 - हॉलीडे रीडिंग (अंग्रेज़ी में बच्चों के लिए कहानियां), 
 - द लास्ट मैन स्टैंडिंग (पर्सनैलिटी डेवलपमेंट बुक)। 

आप सभी लोग उनके ब्लॉग में उनकी शायरियो का लुत्फ़ ले सकते हैं.
http://tanhaai-pursukun.blogspot.com/?m=1 

संजय जी अपनी जड़ो के साथ जुडा रहना चाहते हैं वे कहते है कि बडथ्वाल नाम से तो प्रेम है पर असमंजस में हूं कि क्या वाकई में इस समूह से जुडा हर शखस संजीदा है भी या नहीं या फिर लोग सिर्फ तफरीह के लिए जुड़ रहे है सिर्फ "GOOD MORNING और GOOD NIGHT" बोलने के लिए... वे एक प्रश्न बड़ी संजीदगी से पूछते है की “क्या इनके जिस्म में शिद्दत से वो लहू बह रहा है जो वाकई में उन्हें बड़थ्वाल होने पर एक नई ऊर्जा से भरता हो ? यह प्रश्न हम सबके लिए भी है और हम ही उत्तर भी है उनके प्रश्नों का. 

वर्तमान में संजय जी अपनी माताजी के साथ देहरादून में रहते है. 

आप सभी के साथ मैं उन्हें उनके उज्जवल भविष्य की कामना सहित शुभकामनायें प्रेषित करता हूँ.

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
 भारत १८/४/२१



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