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शनिवार, 15 मई 2021

श्रीधर बड़थ्वाल - एक परिचय




आज विश्व परिवार दिवस है – इसलिए हमारे लिए अच्छा मौका है परिवार की महत्ता को दर्शाता एक जीवन परिचय या कहे परिवार का परिचय. श्री राजेंद्र माणिकलाल बड़थ्वाल भाईसाहब जी द्वारा जो जानकरी प्राप्त हुई उसे आपके साथ साँझा कर रहा हूँ.
‘नौगाँव’ पट्टी मनारस्यूं नजदीक कल्जीखाल, वो बड़थ्वालो का गाँव है जिसमे आज केवल नागराजा का ही मंदिर शेष है. भाईसाहब के अनुसार यह उत्तराखंड का एकमात्र “रेवन्यू विलेज” है. लगभग सौ साल पहले इस गाँव को महामारी ने घेर लिया था तब सभी बड़थ्वाल बेड़गाँव में स्थान्तरित हो गए. इसी गाँव का एक परिवार १०० वर्षो से सयुंक्त परिवार के साथ रह रहा है. यह पंचतंत्र की कहानी की तरह शिक्षाप्रद है.
नौगाँव से पंडित बद्रीदत्त बड़थ्वाल जी भी बेडगांव आ गए थे. उन की दो संताने श्री राधाकृष्ण जी व् श्रीधर जी थे. दोनों भाई भी अपने पिता की तरह दानवीरता व् विद्धता के परिचायक थे. 40 वर्ष की उम्र में ही श्री राधाकृष्ण जी व् उनकी पत्नी का निधन हो गया. उनके दो बेटे (श्री माणिकलाल जी, श्री रामचंद्र जी) और दो बेटियों (सुश्री गोमती कुकरेती, बरसुडी व् सुश्री कृष्णा देवी थपलियाल, तंगोली) की जिम्मेदारी को छोटे भाई श्रीधर प्रसाद जी ने अपने तीन बेटों ( श्री सत्यप्रसाद जी, श्री मोहनलाल जी व् श्री रेवतीनंदन शास्त्री) की जिम्मेदारी के साथ बखूबी निभाया. सभी को उच्च शिक्षा देकर जिम्मेदार नागरिक बनाया. सभी ने अपनी कार्य कुशलता से पारिवार में सहयोग व् योगदान दिया.
श्रीधर प्रसाद बड़थ्वाल ( १९०४ - १६.७/१९८०) जी कई वर्षों तक ग्राम प्रधान रहे. दूर - दूर तक उनके नाम की ख्याति थी. उन्हें कर्मकांड ज्योतिष में महारथ हासिल थी. ज्योतिष बिरादरी में लोग उनके नाम की मिशाल दिया करते थे. आस पास के ५ गाँवों की बिरती उनकी थी. उनकी दी हुई शिक्षा पर उनके परिवार वाले आज भी अमल करते है. वे कहा करते थे की अपने को उठाने के लिए दूसरे को नीचे मत गिराना, बिना पंचायत के अपनों की मदद /सहायता करो, बड़ा वही जो दूसरे को छोटा न समझे और रिश्ते निभाना सीखिए उनसे शिकायत मत कीजिये.
वर्षो पहले श्रीधर जी द्वारा लगाया परिवार का ये वट वृक्ष आज विशाल रूप में है. तीसरी पीढ़ी में उनके ८ नाती, ५ नातिन और चौथी पीढ़ी में १५ परनाती व् १० परनातन है. जो आज भी उसी प्रेमभाव और सेवाभाव से जीवन यापन कर रहे है. आज जीविका के लिए परिवार जहाँ भी बसा हो लेकिन पारिवारिक जुड़ाव जस का तस है व् पूजा हेतु परिवार साथ गाँव जाता है.
हम सब श्रीधर बड़थ्वाल जी की स्मृति नमन करते है. हम सब बड़थ्वाल बंधु परिवार की महत्ता को समझे इस बड़े परिवार “बड़थ्वाल कुटुंब” के साथ जुड़ कर एक नई सोच के साथ मिलकर चले – शुभम
- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल



(आपका सहयोग - आपके विचारो और राय के माध्यम से मिलता रहेगा येसी आशा है और मुझे मार्गदर्शन भी मिलता रहेगा सभी अनुभवी लेखको के द्वारा. इसी इच्छा के साथ - प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल)

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