Flying bat in a marquee
Barthwal's Around the World

> आशा है आपको यहां आ कर सुखद अनुभव हुआ होगा

शनिवार, 11 जुलाई 2015

श्री ललिता प्रसाद बड़थ्वाल – एक परिचय

राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट.... राम भक्त और भक्ति की कई मिसाले इतिहार या धार्मिक ग्रंथो में दर्ज है, लेकिन इस जीवन काल में एक ऐसी ही विभूति से परिचय होना आश्चर्यजनक तो है ही लेकिन स्वयं में एक प्रेरणा एक दर्शन होना भक्ति का साक्षात प्रभु दर्शन करने जैसा होगा. जी हाँ कुछ समय पहले मुझे इसकी जानकारी स्नेही श्री अनिल बड़थ्वाल जी से मिली. और आज उस राम भक्त श्री ललिता प्रसाद बड़थ्वाल जी का उल्लेख करते हुए और आप सब से परिचय कराते हुए हर्ष के साथ सुखद अनुभूति हो रही है. उन्होंने राम नाम को सवा सो करोड़ बार लिखा. ‘राम’ नाम में उभरे दो अक्षरों से सारी रामायण को रच डाला. वे आज भी ‘सीता राम’ शब्द को लिखने में जुटे है. जिसे अब तक वो पौने दो करोड़ बार लिख चुके है. आइये मिलते है इस रामभक्त से और शुरुआत करते है उनके संक्षिप्त परिचय से.

श्री ललिता प्रसाद बड़थ्वाल 

श्री ललिता प्रसाद बड़थ्वाल जी का जन्म उत्तराखंड के गाँव बडेथ, पट्टी ढांगू, हिला पौड़ी गढ़वाल में हुआ. बचपन गरीबी के वातावरण में बीता और हाई स्कूल तक शिक्षा ग्रहण की और फिर जीविका हेतू रेलवे के चतुर्थ श्रेणी में भरती होकर कालका [हरियाणा] आ गए. साथ ही विद्याध्ययन भी करते रहे. ज्योतिष और धर्म के प्रति उनकी आस्था ने, उनकी लगन ने उन्हें रत्न-भूषन-प्रभाकर और विद्यावाचस्पति की उपाधि अर्जित की. २ वर्ष तक वे कालका में गढ़वाल सभा के महा सचिव रहे. सभा के नए प्रतिनधिमंडल में उन्हें प्रचार मंत्री के रूप में कार्य करने का मौका मिला. इसी दौरान उन्होंने लिपिक की परीक्षा पास की, और रेलवे में ही उनका स्थान्तरण भटिंडा [पंजाब] में हो गे. भटिंडा में श्री ललिता प्रसाद जी ने गढ़वाल भ्रातिमंडल की स्थापना की और महामंत्री के पद पर रहे. १९६० में उनका स्थान्तरण हुआ और वे गाजियाबाद आ गए. यहाँ भी कई वर्षो तक वे गढ़वाल सभा के सचिव रहे. पदोन्नति हुई और वे सन १९६८ में दिल्ली  आ गये, रेलवे के प्रधान कार्यलय में वे सीनियर कलर्क, हेड कलर्क एवं सुपरिटेंडेंट की हैसियत से कार्य करते हुए सं १९९१ में वे सेवानिवृत हुए.  

उनका कहना है उनके पिता द्वारा ही उन्हें राम नाम की सीख मिली, उनके पिता रामायण बांचते हुये ही इस संसार से विदा हुए.  जब वे कार्य हेतू नित्य गाजियाबाद से नई दिल्ली जाते थे तो उसी रेल के एक डिब्बे में रामायण सत्संग होता था और उनका इस सत्संग से जुड़ना नियति कहा जा सकता है. बाल्यकाल से ही राम के नाम के साथ जुड़ना उनके जीवन में उस भक्ति को चरितार्थ करना ही था. वे नित्यरामायण सत्संग से जुड़े, एक वर्ष तक उपाध्यक्ष के रूप में संस्था में कार्य किया और ५ वर्षो तक इसी संस्था के अध्यक्ष के तौर पर राम नाम का प्रसार करते रहे. सन १९८\७ में एक धार्मिक सम्मलेन में श्री बड़थ्वाल जी का मिलना हुआ अयोध्या के प्रसिद्ध संत और राम जन्म भूमि के अध्यक्ष श्री नृत्य गोपालदास जी से. उन्ही से श्री ललिता प्रसाद जी को श्री राम नाम\ लेखन की प्रेरणा मिली.  दो अक्षरों ‘राम’ नाम से उन्होंने रामायण के हर श्लोक का सृजन किया और सम्पूर्ण रामायण को उन्होंने राममय बना दिया. श्री बड़थ्वाल जी के गुरु श्री रामानान्दाचार्य के चित्रकूट आश्रम के मानस मंदिर में यह रामायण आज भी भक्तो के दर्शनार्थ रखी हुई है. नौकरी के दौरान सहित [ १९८७ – १९९९] १२ वर्षो तक उन्होंने सव करोड़ बार राम नाम लिखने पर, उनके उत्कृष्ट और राम भक्ति से लबरेज सृजन के लिए उन्हें अंतराष्ट्रीय राम नाम बैंक, अयोध्या के संस्थापक श्री न्रित्यागोपल्दास ने स्वर्णपदक से सम्मानित किया. 

इसी तरह हर श्लोक लिखा हुआ है 

रामायण की प्रति भेंट करते हुए 


गजियाब्द के जगद्गुरु स्वामी श्री रामभद्राचार्य जी ने तुलसीमंडल संस्था की स्थापना की. श्री बडथ्वाल जी इस संस्था के उपाध्यक्ष भी है. मासिक पत्रिका ‘श्री तुल्सीपाठ सौरभ’ के वे १५ वर्षो तक प्रबंध संपादक रहे.  अब वे सांसारिक क्रियाकलापों से मुक्त होकर ‘सीतराम’ लिखने में सलंगन है. अब तक जिसे वे पोने डॉ करोड़ बार लिख चुके है. उनका कहना है कि श्री राम ही उनके डॉक्टर भी है उनका पावन नाम उनके जीवन में परम औषध का कार्य करती है. उनका एक पुत्र इंजिनियर है एवं दूसरा पुत्र जनरल मेनेजर. लेकिन वे राम नाम के साथ स्वयं को जोड़े हुए है. रामायण का ये श्लोक उनकी भक्ति के उद्देश्य को दर्शाता है  

नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥
राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥
अर्थात ऐसे कराल (कलियुग के) काल में तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसार के सब जंजालों को नाश कर देने वाला है। कलियुग में यह राम नाम मनोवांछित फल देने वाला है, परलोक का परम हितैषी और इस लोक का माता-पिता है.

हर अक्षर में राम - राम शब्द को जोड़ कर पूरी रामचरित्र मानस को अपनी हस्तलिपि द्वारा पूर्ण करना असाधरण कार्य है. श्री बड़थ्वाल जी ने अधिकांश जीवन साहित्य और धर्म के सेवा में लगा दिया है. इस अद्वितीय एवं महान कार्य को पूर्ण करने में उनकी वर्षो की साधना और लगन है. इस महान रचना के रचयिता और राम भक्त को हम प्रणाम करते है. प्रभु से उनकी लम्बी आयु और स्वस्थता की कामना करते है. 


आपका सहयोग - आपके विचारो और राय के माध्यम से मिलता रहेगा येसी आशा है और मुझे मार्गदर्शन भी मिलता रहेगा सभी अनुभवी लेखको के द्वारा. इसी इच्छा के साथ - प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

गुरुवार, 6 जून 2013

डॉ माधुरी बड़थ्वाल और लोक संगीत - एक परिचय





ज मुझे आप मित्रो से डॉ माधुरी बड़थ्वाल का परिचय करवाते हुये हर्ष हो रहा है।

ढाई वर्ष की उम्र से संगीत, सुरों और नृत्य से प्रेम करनी वाली छोटी बालिका आज किसी परिचय की मोहताज तो नही लेकिन मेरा प्रयास इस नाम को उन सब लोगो तक पहुँचाने का है जो इस व्यक्तित्व से परिचित नही थे मेरी तरह।

डॉ. माधुरी बड़थ्वाल जी ( जन्म 19 मार्च 1953 ) आल इंडिया रेडियो की प्रथम महिला म्यूज़िक कम्पोजर है। उन्होने बड़े पैमाने पर उत्तराखंड के लोक संगीत (गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी) के प्रचार, पलेखन और सरंक्षण के लिए पिछले 45 सालो से निरंतर कार्य किया है। उन्होने इसके लिए बड़ी मात्रा मे भ्रमण कर उत्तराखंड के हर उम्र के कलाकारो को पहचाना। सैकड़ो विद्यार्थियो को उन्होने सिखाया भी और निर्देशित भी किया। उन्होने उत्तराखंड के दुर्लभ वाद्य यंत्रो को दस्तावेज़ के रूप मे सँजोया भी है और उन्होने परम्पराओ को अपनी सोच के साथ सहेजने का प्रयास किया है। उन्होने लोक संगीत के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत को मिश्रित किया है। डॉ माधुरी ने उत्तराखंड के कई पुराने और अंजान कलाकारों जैसे जमुना देवी, भगीरथी देवी, बसन्ती देवी को भी रिकोर्ड किया है
लोकगायक चन्द्र सिंह राही के साथ           व्      पारंपरिक वेश भूषा मे डॉ माधुरी बड़थ्वाल 

५ साल की उम्र मे ताऊ जी की कही बात को दिल पर लेकर, उनके द्वारा दिये गए एक आने को वहीं रखकर, परिश्रम को हथियार बनाकर ज़िंदगी मे आगे बढ़ने की सोच और भाई बहनो को पढ़ाई के लिए प्रेरित करना उन्होने मकसद बना लिया। प्रकृति के सुरमय सहज व अनुशासित नगर लैन्सडाउन मे अपनी शिक्षा की शुरुआत की। पिता श्री चंद्रमणि उनियाल [गायक व सितारवादक भी] ने समाज की विपरीत टिप्पणियॉ को नज़र अंदाज करते हुये प्रयाग संगीत समिति मे विधिवत संगीत की शिक्षा दिलाई। डॉ माधुरी ने हाई स्कूल करते ही अपनी मेहनत के बलबूते संगीत प्रभाकर की डिग्री हासिल कर ली और फिर  अपने ही विद्यालय राजकीय इंटर कालेज लैंसडाउन मे संगीत अध्यापिका के पद पर कार्य किया। प्रथम गुरु श्री गणेश केलकर, गुरु श्री ज्वाला प्रसाद गुरु श्री मकसूद हुसेन [सारंगी वादक] से संगीत और राग रागिनियों की बारीकियों का अध्ययन किया। उन्नति के मार्ग पर अग्रसर माधुरी जी को आकाशवाणी नजीबाबाद मे प्रथम महिला म्यूज़िक कम्पोजर [ तत्कालीन केंद्र निदेशक श्री एस के शर्मा के अनुसार ] के रूप मे अखिल भारतीय स्तर पर पहचान मिली। इस दौरान माधुरी जी ने सैकड़ो संगीत, नाटको और रूपको का कुशल निर्देशन, लेख्न और निर्माण किया। नानी जी, ताई जी व माता जी से के साथ कई बुज़र्गों के द्वारा गढ़वाली भाषा [मुहावरे, लोकोक्तियाँ, लोकगीतो लोक गाथाओ व कथाओं ] का गूढ ज्ञान विरासत रूप मे प्राप्त किया और वही हिन्दी मे स्नातकोर करने के साथ ही संगीत और साहित्य का अनूठा रिश्ता बनाता चला गया। ।

डॉ मनु राज शर्मा व् डॉ माधुरी बड़थ्वाल 

पति डॉ मनुराज शर्मा [ जो संगीत के मर्मज्ञ थे] की प्रेरणा से शोध कार्य [उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर] मे स्वयं को तल्लीन कर और पांडुलिप्पी तैयार की।  नजीबाबाद से प्रसारित धारावाहिक 'धरोहर' का सृजनात्मक प्रसारण किया जिसमे उनके द्वारा संग्रहित धरोहर का उपयोग हुआ और पुनमूर्ल्याकन भी हुआ। इसी बीच ३ अक्तूबर २००३ मे डॉ मनुराज ने माधुरी जी का साथ छोड़ परलोक सिधार गए। कठिनतम और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, पति की मृयु के तीन बाद ही स्टुडियो मे बैठ 'धरोहर' का निर्माण किया - डॉ मनुराज का स्नेह और उनकी प्रेरणा ने ही उनमे यह आत्मविश्वास बनाए रखा। परिवार मे ज्येष्ठ सतीश चंद्र बड़थ्वाल जेठानी चन्द्रकला बड़थ्वाल व भतीजी नीरा बड़थ्वाल ने इस वक्त पर उन्हे और परिवार को मनोबल दिया। अपने शोध कार्य के लिए उन्हे बहुत लोगो का साथ मिला जिसमे उनके परिवार के सदस्य ससुर श्री संतन बड़थ्वाल [पूर्व विधायक], पुत्री येन्नी मदालसा, पुत्र मानस मनु और मानवेन्द्र मनु का योगदान सराहनीय है


अब डॉ माधुरी बड़थ्वाल संगीत को अपनी संस्था ' मनु लोक सांस्कृतिक धरोहर संवर्धन संस्थान'  के माध्यम से सँजोये रखने के प्रयास मे कार्यरत है समर्पित है । डॉ माधुरी लोक संगीत पर शोध करने वाले देश और विदेशो के शोध विद्यार्थियों का मार्ग दर्शन करती है। संस्कृति विभाग में लोक कलाकारों को सूचीबद्ध करने में डॉ माधुरी ने निर्णायक भूमिका निभाई। आज भी उन्हें आल इण्डिया रेडियो या उत्तराखंड के कई आयोजनों को मुख्य अतिथि के रूप में निवेदन किया जाता है निमंत्रित किया जाता है। नारी सशक्तिकरणके लिए उनके प्रयास व् कार्य सराहनीय है।


उत्तराखंड के संगीत व लोक संगीत की धरोहर के लिए कार्यरत डॉ माधुरी बड़थ्वाल जी को कोटि कोटि प्रणाम और हमारी शुभकामनायें।
उत्तराखंड के सुर सम्राट नरेंद्र सिंह नेगी जी के साथ [ फोटो सौजन्य डॉ माधुरी बड़थ्वाल]

चलते चलते सुनिए सुर सम्राट नरेंद्र सिंह नेगी जी के साथ गाया डॉ माधुरी जी का ये गीत 'स्याली बसंती'



...... धन्यवाद
आपका
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

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रविवार, 21 अक्तूबर 2012

मैं किलै जाऊँ पहाड़

(इस रचना मे गाँव के लोगो की आस व आज के नौजवानो का जबाब )



उतराखंड का दाना सयाणा
बस रंदीन दिन रात बरड़ड़ाणा
नौना नौनियूं तुम बौड़ी आवा 
उत्तराखण्डे की संस्कृति ते पछाणा
कूड़ी - बाड़ी ते अपणी देखि ल्यावा 
बची च लस अबी, हमते देखी जावा 
बाद मा याद केरी की फिर पछ्तेला 
जलम भूमि कु करज कन मा चुके ला
आ जावा अपणा पहाड़... 

अरे बाडा, अरे दद्दा, किले छाँ बुलाणा
किले छाँ अपणी तुम जिकुड़ी जलाणा
आज तलक हम ते क्या दे ये पहाड़ा न 
न शिक्षा न नौकरी, बौड़ी की क्या कन 
मैं किलै जाऊँ पहाड़ ..... 

हिन्दी आप लोग बिंगी नी सकदा, 
अँग्रेजी हमर दगड़ बोली न सकदा
भैर जै की हमुन हिन्दी अँग्रेजी सीखी 
गढ़वली - कुमौनी ते कीसा उंद धैरी
मैं किलै जाऊँ पहाड़ ..... 

गढ़वली - कुमौनी मी अब नी बुल्दू 
समझ मी जांद पर बोली की सक्दू
छन कथगा जु बुलदिन अपणी भासा 
पर पछाण हमरी हिन्दी अंगरेजी भासा
मैं किलै जाऊँ पहाड़ ..... 

उकाल गौं की अब मी नी चेढ़ सकदू
बाड़ी झुंगरु कंडली अब मी ने खे सकदू 
झुकी की खुटा मी केकु नी छ्वै सकदू
बिना दाँतो की बात अब नी बींगी सकदू
मैं किलै जाऊँ पहाड़ ..... 

मी कखी छौं गढ़वली, कखी छौं कुमौनी 
किलेकि उख ह्वे जांदी थ्वाड़ा खाणी पीणी
इनै - उनै केबर मी उत्तराखंडी बण जान्दू
उत्तराखण्डे की बात पर पिछने सरकी जान्दू
मैं किलै जाऊँ पहाड़ ..... 

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 


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मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

धन्यवाद

 बहुत दिन बाद अचानक देखा कि प्रतिबिम्ब भाई यहाँ भी बैठे हैं . अच्छा लगा .  -विजय बड़थ्वाल

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

रक्षा बंधन



~ रक्षा बंधन ~

देव - दानवो के युद्ध मे जब दानव हावी थे 
इंद्राणी ने इन्द्र को तब पवित्र धागा बांधा था  
इस धागे की शक्ति से इन्द्र ने विजय पायी थी 
श्रावण पूर्णिमा के दिन यह पल आया था 

विष्णु ने जब राजा बलि से संसार मांग लिया था  
बलि की भक्ति ने विष्णु को तब अपने संग रोका था 
लक्ष्मी ने बांध इसे बलि को विष्णु को तब पाया था 
श्रावण पूर्णिमा के दिन यह पल आया था 

शिशुपाल का वध जब कृष्ण ने किया था 
कृष्ण की तर्जनी से बहता खून का रेला था
द्रौपदी ने चीर बांध कृष्ण के खून को रोका था 
श्रावण पूर्णिमा के दिन यह पल आया था  

रानी कर्णवती ने हुमायूँ को यह राखी भेजी थी 
हुमायूँ ने फिर बहादुरशाह के संग की लड़ाई थी 
सिकंदर की भार्या ने भी पुरू को राखी भेजी थी 
इस धागे ने ही तब सिकंदर की जान बचाई थी  

केवल बहन भाई के रिश्ते का धोतक नही है 
केवल लेन देन का रिश्ता इसकी सोच नही है 
एक दूजे की रक्षा करने का यह मज़बूत धागा है
स्नेह और समर्पण का यह धागा तो बस गवाह है  

ब्राह्मण इसे यजमान को बांध आपति से बचाता है
सीमा पर सैनिकों का भी ये धागा मनोबल बढ़ाता है 
मित्रो मे भी यह धागा स्नेह और विश्वास जगाता है  
श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन यह शुभ पल आता है  

सभी बड़थ्वाल बंधुओ को  रक्षाबंधन की बधाई एवं शुभकामनायें!!!

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 


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शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

डॉ० पीतांम्बरदत्त बड़थ्वाल की पुण्यतिथि के अवसर पर



डॉ० पीतांम्बरदत्त बड़थ्वाल 

( १३ दिसंबर, १९०१ - २४ जुलाई, १९४४)

(हिंदी में डी.लिट. की उपाधि प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय, साहित्यकार एवम शोधकर्ता)  



पाली ग्राम (उत्तराखंड) में हिन्दी का जन्मा लाल
कर शोध हिन्दी में पहली बार सबको दिखाई नई राह
बने प्रथम भारतीय् जिन्होने डी.लिट हिन्दी में पाई
नाम इस साहित्य्कार का था डा.पीताम्बर दत्त बडथ्वाल

हिन्दी काव्य मे निर्गुणवाद पर कर गये वो शोध
संस्कृत,अवधी,ब्रजभाषा अरबी व फारसी का था उनको बोध
संत,सिद्ध,नाथ और भक्ति का किया उन्होने विश्लेषण
दूर दृष्टि के थे वे परिचायक,निबंधकार और थे वे समी़क्षक

हिन्दी को नया आयाम दे गया ये हिन्दी का सेवक
कर गया दुनिया मे नाम हिन्दी का ये लेखक
छात्र करते है शोध आज भी पढ उनकी रचनाये
कह गये जो वो उसे लोग आज भी अपनाये

अल्प आयु मे कह गया अलविदा वो हिन्दी का नायक
दे गया धरोहर हमे गोरखबाणी और नाथ सिद्धो की रचनाओ का
आज भले ही भूल चुका है उन्हे हिन्दी का साहित्य समाज
हिन्दी का सम्मान करे, कर याद इस लेखक को आज
-       प्रतिबिंब बडथ्वाल
पुण्यतिथि के अवसर पर हम सभी  उन्हे़  याद करते है और स्मृति मे श्रधा सुमन अर्पित करते है. साहित्य जगत, हिन्दी से प्रेम करने वाले और परिवार सर्वदा आपको तथा आपके द्वारा किये कार्यो को याद रखेगा


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शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

तो क्या बात होती


ख्वाब हकीकत बन जाते तो क्या बात होती

हम - तुम एक हो जाते तो क्या बात होती



तेरा दर्द मैं सह पाता तो क्या बात होती

तेरे आंसू मेरी आंख से आते क्या बात होती



तेरा गम मैं समेट पाता तो क्या बात होती

तेरी परछाई मैं बन पाता तो क्या बात होती



मेरी खुशनसीबी तुम्हें मिल जाती तो क्या बात होती

तुम्हारा प्यार मुझे मिल जाता तो क्या बात होती



मेरा सुख-चैन तुम को मिल जाता तो क्या बात होती

मेरी मुस्कराहट तुम को मिल जाती तो क्या बात होती



तेरे दामन में ख़ुशियाँ मैं भर पाता तो क्या बात होती

दुनिया की बुरी नज़र से बचा पाता तो क्या बात होती

-प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल
(पुराने ब्लाग से ली गई रचना)


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मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

तुम जो मिल गये हो




तुम मिले तो मेरे हालात बदलते चले गये
यूँ मिलते जुलते अहसास बदलते चले गये,

तन्हाई को मेरी हमसफ़र तुम सा मिल गया
जीने को मुझे सहारा अब तुम सा मिल गया

तुम्हारी झुकी पलकों के आशिक हम बन गये
चलते चलते इस राह मे हमराही हम बन गये

रात की खामोशी हो या हो दिन कि चंचलता
प्यार का अशियाना तुम्हारी बातो से है बनता

लेकर हाथो में हाथ हर पल रहता है तुम्हारा साथ
बन जाती है बिगडी बात जब रहती हो तुम साथ

-प्रतिबिम्ब बडथ्वाल
(पुरानी रचना दुसरे ब्लाग से)


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बुधवार, 30 सितंबर 2009

डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल - हिंदी में डी.लिट. की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले शोध विद्यार्थी


डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल ( १३ दिसंबर, १९०१-२४ जुलाई, १९४४) हिंदी में डी.लिट. की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले शोध विद्यार्थी

डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल का जन्म तथा मृ्त्यु दोनो ही पाली ग्राम( पौडी गढवाल),उत्तराखंड, भारत मे हुई. बाल्यकाल मे उन्होने "अंबर" नाम से कविताये लिखी. फिर कहानिया व संपादन ( हिल्मैन नामक अंग्रेजी पत्रिका) किया. डॉ० बड्थ्वाल ने हिन्दी में शोध की परंपरा और गंभीर अधय्यन को एक मजबूत आधार दिया. आचार्य रामचंद्र शुक्ल और बाबू श्यामसुंदर दास जी के विचारो को आगे बढाया और हिन्दी आलोचना को आधार दिया. वे उत्तराखंड की ही नही भारत की शान है जिन्हे देश विदेशो मे सम्मान मिला. उत्तराखंड के लोक -साहित्य(गढवाल) के प्रति भी उनका लगाव था.

डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल भारत के प्रथम शोध छात्र है जिन्हे १९३३ के दीक्षांत समारोह में डी.लिट(हिन्दी) से नवाज़ा गया उनके शोध कार्य " हिन्दी काव्य मे निर्गुणवाद" ('द निर्गुण स्कूल आफ हिंदी पोयट्री' - अंग्रेजी शोध पर आधारित जो उन्होने श्री श्यामप्रसाद जी के निर्देशन में किया था) के लिये.

उनका आध्यातमिक रचनाओ की तरफ लगाव था जो उनके अध्यन व शोध कार्य मे झलकता है. उन्होंने संस्कृत, अवधी, ब्रजभाषा, अरबी एवं फारसी के शब्दो और बोली को भी अपने कार्य मे प्रयोग किया. उन्होने संत, सिद्घ, नाथ और भक्ति साहित्य की खोज और विश्लेषण में अपनी रुचि दिखाई और अपने गूढ विचारो के साथ इन पर प्रकाश डाला. भक्ति आन्दोलन (शुक्लजी की मान्यता ) को हिन्दू जाति की निराशा का परिणाम नहीं माना लेकिन उसे भक्ति धारा का विकास माना. उनके शोध और लेख उनके गम्भीर अध्ययन और उनकी दूदृष्टि के भी परिचायक हैं. उन्होने कहा था "भाषा फलती फूलती तो है साहित्य में, अंकुरित होती है बोलचाल में, साधारण बोलचाल पर बोली मँज-सुधरकर साहित्यिक भाषा बन जाती है". वे दार्शनिक वयक्तित्व के धनी, शोधकर्ता,निबंधकार व समीक्षक थे. उनके निबंध/शोधकार्य को आज भी शोध विद्दार्थी प्रयोग करते है. उनके निबंध का मूल भाव उसकी भूमिका या शुरुआत में ही मिल जाता है.

निम्नलिखित कृ्तिया डॉ० बडथ्वाल की सोच, अध्यन व शोध को दर्शाती है.

· रामानन्द की हिन्दी रचनाये ( वारानसी, विक्रम समवत २०१२)

· डॉ० बडथ्वाल के श्रेष्ठ निबंध (. श्री गोबिंद चातक)

· गोरखवाणी(कवि गोरखनाथ की रचनाओ का संकलन व सम्पादन)

· सूरदास जीवन सामग्री

· मकरंद (. डा. भगीरथ मिश्र)

· 'किंग आर्थर एंड नाइट्स आव द राउड टेबल' का हिन्दी अनुवाद(बच्चो के लिये)

· 'कणेरीपाव'

· 'गंगाबाई'

· 'हिंदी साहित्य में उपासना का स्वरूप',

· 'कवि केशवदास'

· 'योग प्रवाह' (. डा. सम्पूर्णानंद)

उनकी बहुत सी रचनाओ मे से कुछ एक पुस्तके "वर्डकेट लाईब्रेरी" के पास सुरक्षित है..हिन्दी साहित्य अकादमी अब भी उनकी पुस्तके प्रकाशित करती है. कबीर,रामानन्द और गोरखवाणी (गोरखबानी, सं. डॉ० पीतांबरदत्त बडथ्वाल, हिंदी साहित्य संमेलन, प्रयाग, द्वि० सं०) पर डॉ० बडथ्वाल ने बहुत कार्य किया और इसे बहुत से साहित्यकारो ने अपने लेखो में और शोध कार्यो में शामिल किया और उनके कहे को पैमाना माना. यह अवश्य ही चिंताजनक है कि सरकार और साहित्यकारो ने उनको वो स्थान नही दिया जिसके वे हकदार थे. प्रयाग विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर डा॰ रानाडे भी कहा कि 'यह केवल हिंदी साहित्य की विवेचना के लिये ही नहीं अपितु रहस्यवाद की दार्शनिक व्याख्या के लिये भी एक महत्त्वपूर्ण देन है.

"नाथ सिद्वो की रचनाये " मे ह्ज़ारीप्रसाद द्विवेदी जी ने भूमिका मे लिखा है

" नाथ सिद्धों की हिन्दी रचनाओं का यह संग्रह कई हस्तलिखित प्रतियों से संकलित हुआ है. इसमें गोरखनाथ की रचनाएँ संकलित नहीं हुईं, क्योंकि स्वर्गीय डॉ० पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ की रचनाओं का संपादन पहले से ही कर दिया है और वे गोरख बानी नाम से प्रकाशित भी हो चुकी हैं (हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग). बड़थ्वाल जी ने अपनी भूमिका में बताया था कि उन्होंने अन्य नाथ सिद्धों की रचनाओं का संग्रह भी कर लिया है, जो इस पुस्तक के दूसरे भाग में प्रकाशित होगा. दूसरा भाग अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है अत्यंत दुःख की बात है कि उसके प्रकाशित होने के पूर्व ही विद्वान् संपादक ने इहलोक त्याग दिया. डॉ० बड़थ्वाल की खोज में 40 पुस्तकों का पता चला था, जिन्हें गोरखनाथ-रचित बताया जाता है. डॉ० बड़थ्वाल ने बहुत छानबीन के बाद इनमें प्रथम 14 ग्रंथों को निसंदिग्ध रूप से प्राचीन माना, क्योंकि इनका उल्लेख प्रायः सभी प्रतियों में मिला.तेरहवीं पुस्तक ग्यान चौंतीसा समय पर न मिल सकने के कारण उनके द्वारा संपादित संग्रह में नहीं आ सकी, परंतु बाकी तेरह को गोरखनाथ की रचनाएँ समझकर उस संग्रह में उन्होंने प्रकाशित कर दिया है".

उन्होने बहुत ही कम आयु में इस संसार से विदा ले ली अन्यथा वे हिन्दी में कई और रचनाओ को जन्म देते जो हिन्दी साहित्य को नया आयाम देते. डॉ० संपूर्णानंद ने भी कहा था यदि आयु ने धोखा न दिया होता तो वे और भी गंभीर रचनाओं का सर्जन करते'

उतराखंड सरकार, हिन्दी साहित्य के रहनुमाओ एवम भारत सरकार से आशा है कि वे इनको उचित स्थान दे.

(आप में से यदि कोई डॉ० बड़थ्वाल जी के बारे में जानकारी रखता हो तो जरुर बताये)



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शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

सच्चा हिन्दुस्तानी कहलाये


तिरंगा हमारी आन है बान है
हर हिंदुस्तानी की ये शान है

शहीदों की कुर्बानी की अलग कहानी
कुछ गोली खाकर शहीद कहलाये
कुछ फ़ासी के फ़ंदे पर झूल गये
कुछ ने देश के लिये किया समर्पण
कुछ ने किया सब कुछ अपना अर्पण

आज हम हर माने में स्वतंत्र है
लेकिन फ़िर भी बिगड़े सारे तंत्र है
गरीबी अमीरी की खाई बढती जा रही
आंतक की बू हर दिन फैल रही
राजनीति भी खूनी - खेल खेल रही

आजादी के जशन हम हर साल मनाते है
लेकिन मानवता को हर पल भूलते जा रहे है
देश और लोग उन्नति की ओर अग्रसर है
आम जिदगी फ़िर भी इससे बेअसर है
ढूँढते रहते ये सब किसका कसूर है?


आओ आज तिरंगा फ़िर लहराये
अमीरी गरीबी का ये भेद मिटाये
राजनीति से हटकर प्रेम फैलाये
जाति - भाषा का ये जाल हटाये
खुद को सच्चा हिन्दुस्तानी कहलाये।

- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल

(पिछले साल लिखी हुई एक रचना)




आपका सहयोग - आपके विचारो और राय के माध्यम से मिलता रहेगा येसी आशा है और मुझे मार्गदर्शन भी मिलता रहेगा सभी अनुभवी लेखको के द्वारा. इसी इच्छा के साथ - प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

हमारा उद्देश्य

When we dream alone it is only a dream, but when many dream together it is the beginning of a new reality.